5. लोक सेवाएं - Page 111

94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

  1. स्वतंत्र प्रांतीय सिविल सेवा प्रणाली के केवल यही लाभ नहीं हैं। सेवा का अखिल भारतीय स्वरूप वेतन, अवकाश भत्तों, पदोन्नतियों और पेंशनों से सम्बद्ध सेवा की शर्तों में प्रांतों पर एकरूपता थोपता है। मेरा कहना है कि इस एकरूपता से अपेक्षाकृत कम सम्पन्न प्रांतों के संसाधनों पर भारी भार पड़ेगा ही। उन्हें सेवा के लिए अपनी उचित क्षमता के बाहर भुगतान करना पड़ता है। ना ही यह कहा जा सकता है कि हर प्रांत में समान जीवन स्तर सुनिश्चित करने के लिए समान वेतन स्तर आवश्यक है। कौन नहीं जानता कि स्थानीय परिस्थितियों में अंतर होने के कारण दो अलग - अलग प्रांतों में नितांत अलग - अलग वेतन से समान स्तर की सुविधा प्राप्त की जा सकती है। यदि ऐसा है तो इसका कारण कोई नहीं कि वेतनों में समानता रखी जाए जबकि वह बोझिल भी हों और असंगत भी।

  2. सेवा की शर्तों में एकरूपता की आवश्यकता का जन्म भी सिविल सेवा के अखिल भारतीय स्वरूप से हुआ है। और यह तब तक समाप्त नहीं होगी, जब तक सेवा का वह स्वरूप बना रहता है। स्वतंत्र प्रांतीय सिविल सेवा का गठन इस लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए, विशेष रूप से उस समय जब कि इसके गठन से प्रशासन के खर्च में कमी आ सकती है और प्रांतों को अपना कामकाज करने की पूरी आजादी मिल सकती है। निश्चय ही इसका अर्थ यह है कि लोक सेवा के लिए भरती के मामले में प्रांतीय सरकारों की तुलना में भारत मंत्री की हैसियत में आमूल परिवर्तन होना ही चाहिए। इसके स्थान पर कि भारत मंत्री मुख्य नियोजक हो और अपने प्रांतों में कार्य के लिए जरूरी अधिकारियों की मांग प्रांतीय सरकार उससे करे, होना यह चाहिए कि भारत मंत्री उन मामलों में जिनमें इंग्लैंड में भरती जरूरी हो, केवल सम्बद्ध विशेष प्रांतों के एजेन्ट के रूप में कार्य करे। उसके लिए शर्तें प्रांतीय सरकार तय करे, न कि स्वयं वह करे। अतः प्रांतों को तुरंत अब ऐसा अधिकारी नहीं रखना चाहिए, जो उन व्यक्तियों की सेवा का उपयोग करता हो, जिन्हें भारत उन्हें देता हो या उनके लिए खोजता हों। जब तक ऐसी प्रणाली जारी रहती है, तब भारत मंत्री भारत सरकार अधिनियम की धारा 96 ख के अधीन प्राप्त अधिकारों का उपयोग करता ही रहेगा। सिविल सेवा पर भारत मंत्री के अधिकारों का शिकंजा बने रहने का घोर विरोध मंत्रियों ने इस आधार पर किया है। उनके रहते उत्तरदायी सरकार की स्थापना हो ही नहीं सकती। आलोचना बिल्कुल ठीक है। परन्तु जो ऐसी आलोचना करते हैं, शायद वे यह नहीं जानते कि ये अधिकार तभी समाप्त किए जा सकते हैं, जब भारत मंत्री भरती अधिकारी नहीं रहेगा।

  3. यदि सेवाओं के विभाजन का यह सुधार अमल में लाया जाए, तो मैं सुझाव देता हूँ कि प्रांतीय सिविल सेवा का इस प्रकार वर्गीकरण किया जाए :