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लोक सेवाएं

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जो इस बात की पड़ताल करेगा कि विभिन्न प्रांतीय सरकारों की वित्तीय स्थिति क्या है और लोक सेवकों की उपलब्धियों के भुगतान पर होने वाले खर्च के उच्च अनुपात के कारण उनमें से हरेक को गंभीर परेशानियां उठानी पड़ रही हैं। मुझे पता है कि कुछ भारतीय ऐसे हैं, जो वेतनों की असमानता के सिद्धान्त पर आपत्ति करते हैं, परन्तु यह ध्यान रखा जाए कि ये आपत्तियां उन भारतीयों की ओर से उठाई जाती हैं, जिनमें से अधिकतर लोग सिविल सेवा के लिए भरती किए जाते हैं और जो देश के नेता होने का दम भरते हैं। उनका तर्क घृणित, ओछा और थोथा है। वह निस्सार है, क्योंकि यह आवश्यक नहीं कि वेतन में असमानता के कारण दर्जे में असमानता आ ही जाए। यह मान्य नहीं है, क्योंकि इसमें स्वार्थ निहित है। मैं भारतीयकरण के पक्ष में मुख्यतः इसलिए हूँ कि इससे अर्थव्यवस्था का भविष्य बहुत कुछ सुधरेगा।

  1. ( III ) भारतीयकरण और पिछड़े वर्गों के दावे : यह सर्वविदित है कि देश की लोक सेवाएं जहां तक कि उनके द्वार भारतीयों के लिए खुले हैं, विभिन्न परिस्थितियों के कारण ब्राह्मणों तथा उनसे जुड़ी जातियों के लिए सुरक्षित शिकारगाह बन गई हैं। गैर - ब्राह्मण, दलित वर्ग और मुसलमान वस्तुतः उनमें प्रवेश नहीं कर सकते। लोक सेवाओं में अपना समुचित हिस्सा प्राप्त करने के लिए वे तीव्र आन्दोलन चला रहे हैं। इस प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए वे चयन द्वारा नियुक्ति की प्रणाली को खुली प्रतियोगिता द्वारा नियुक्ति से बेहतर समझते हैं। ब्राह्मण और उनसे जुड़ी जातियां उसका जोर - शोर से विरोध कर रही हैं। उनका कहता है कि राज्य के हित में यह वांछनीय है कि सार्वजनिक पदों पर नियुक्तियों के संबंध में दक्षता एकमात्र मापदंड होनी चाहिए और जाति अथवा नस्ल को ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए। यह मानकर कि शिक्षा संबंधी योग्यता ही एकमात्र मापदंड है, जिससे दक्षता मापी जा सके, वे आग्रह करते हैं कि सार्वजनिक पदों को केवल प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर ही भरा जाए। कहा जाता है कि ऐसी प्रणाली दक्षता के लक्ष्यों को पूरा करती है और लोक सेवाओं में पिछड़े वर्गों के प्रवेश पर कोई रोक नहीं लगाती। प्रतियोगी परीक्षाएं सभी जातियों तथा नस्लों के लिए खुली हैं। यदि इन जातियों का कोई उम्मीदवार वांछित कसौटी पूरी करता है, तो वह भी परीक्षा में बैठ सकता है।

  2. इसमें कोई शक नहीं है कि इस प्रश्न पर ब्राह्मणों और उनसे जुड़ी जातियों के रवैए में निष्पक्षता का आभास है। प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रणाली सभी जातियों और नस्लों के लिए विशिष्ट परिस्थितियों में निष्पक्ष सिद्ध हो सकती है। परन्तु उन परिस्थितियों की पूर्व अपेक्षा है कि सरकार की शिक्षा प्रणाली पर्याप्त लोकतांत्रिक हो और शिक्षा की सुविधाएं पर्याप्त रूप से व्यापक हो और उन सभी वर्गों को पर्याप्त रूप से सुलभ हों, जिनमें से लोक सेवा के लिए अच्छे उम्मीदवार प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। अन्यथा निश्चित है कि खुली प्रतियोगिता की प्रणाली के बावजूद बहुत सारे वर्ग इसकी परिधि से बाहर रह जाएंगे। जाहिर है कि भारत में यह बुनियादी परिस्थिति है ही