5. लोक सेवाएं - Page 115

98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

नहीं। अतः पिछड़े वर्गों से यह कहना कि वे लोक सेवाओं में प्रवेश के साधन के रूप में प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणामों पर भरोसा करें, उनके साथ छल करना है और यह नितांत उचित है कि पिछड़े वर्गों ने छले जाने से इंकार कर दिया है।

  1. यदि हम यह मानकर चलें कि पिछड़े वर्ग खुली प्रतियोगिता के सहारे लोक सेवाओं में प्रवेश नहीं कर सकते तो विचार के लिए पहला प्रश्न यह उठता है कि क्या पिछड़े वर्गों को किसी रियायत की जरूरत है। जब तक वे अपने पक्ष का भलीभांति प्रतिपादन नहीं करते, तब तक वे भरती के मान्य सिद्धान्तों में विशुद्ध दक्षता के अलावा अन्य किसी आधार पर संशोधन की आशा नहीं कर सकते। इस महत्वपूर्ण प्रश्न के बारे में मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि पिछड़े वर्गों के दावे में दम है।

  2. सबसे पहली बात तो यह है कि जो लोग लोक सेवाओं में भरती के लिए सिर्फ दक्षता पर बल देते हैं, उन्हें इस बारे में पर्याप्त ज्ञान नहीं दीख पड़ता कि आधु­ निक काल में प्रशासन का क्षेत्र क्या है? उन्हें तो बस यही लगता है कि प्रशासन तो विधायिका द्वारा बनाए गए कानून को लागू करने की प्रक्रिया भर है। इसमें संदेह नहीं कि वह प्रशासन-क्षेत्र और महत्व के बारे में अति अधूरी अवधारणा है। आधुनिक काल में प्रशासन का उद्देश्य केवल इतना ही नहीं है कि राज्य के विनियमों की जानकारी के लिए कानूनों की छानबीन की जाए, बल्कि उससे कहीं अधिक व्यापक हैं। अक्सर समय के तकाजे पर यह सुविधा के लिए किसी सरकारी विभाग को आजकल नियम - रचना के व्यापक अधिकार सौंपे जाते हैं, ताकि वह किसी खास कानून का पालन करा सके। ऐसी स्थितियों में यह स्पष्ट है कि प्रशासन का अर्थ केवल कानून लागू करना ही नहीं है। उसका काम ऐसे नियम बनाना भी है, जिन्हें कानून की शक्ति प्राप्त हो। वह उनका पालन भी कराता है। प्रत्यायोजन द्वारा विधायन की यह प्रणाली सभी आधुनिक सरकारों की अति सामान्य प्रथा बन गई है और आशा है कि आने वाले वर्षों में वह और पनपेगी। इसे निर्विवाद रूप से स्वीकार करना ही होगा कि जनता के विशाल वर्गों के कल्याण से संबंधित नियम - निर्माण के ऐसे व्यापक अधिकार निरापद रूप से ऐसे प्रशासकों के हाथों में नहीं सौंपे जा सकते, जो किसी वर्ग विशेष के हैं। वस्तुतः इस वर्ग के उद्देश्य और हित शेष जनवर्ग से भिन्न हैं। यह वर्ग विशेष अन्य वर्गों में व्याप्त चेतन शक्तियों से हमदर्दी नहीं रखता, उनकी जरूरतों, दुखदर्द और इच्छाओं को नहीं समझता उनकी आकांक्षाओं के प्रति वैर - भाव रखता है। उसका सीधा सा कारण है कि उसे शिक्षा की कसौटी के आधार पर श्रेष्ठ ठहराया जाता है।

  3. लेकिन यदि यह मान भी लें कि प्रशासन केवल विधायिका द्वारा बनाए गए कानून को लागू करने की प्रक्रिया भर है, फिर भी इससे पिछड़ी जातियों का पक्ष तनिक भी निर्बल नहीं होता। क्योंकि जो अधिकारी एक जाति विशेष से आते हैं और जिन्हें लोक - कर्तव्य के प्रति निष्ठा से जातीय प्रतिष्ठा अधिक प्यारी होती है, वे अपनी