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108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

यह नितांत जरूरी है कि वह यूरोप की सादृश्यताओं से अपने मन को मुक्त कर ले, जो अक्सर स्वयं को अनजाने में चुपके - चुपके आंग्ल - भारतीय अटकलों की ओर ले जाती हैं। यूरोप की, विशेषतः इंग्लैंड की, परिस्थितियों ने शिष्टाचार, धन, राजनीतिक व सामाजिक प्रभाव के सुस्पष्ट आधार पर उच्च एवं निम्न वर्ग के बीच एक लक्ष्मण रेखा खींच दी है। भारत में ऐसी कोई लक्ष्मण रेखा नहीं है। यहाँ सभी निरंकुश शासकों की भांति राजा की इच्छा सर्वोपरि थी, वह चाहे तो रंक को राजा बना सकता था, पर ऐसी कोई रेखा न होने के कारण यहाँ आचरण में सदैव भारी समानता रही है। अंग्रेजी धारणा के अनुसार भिखारी केवल पशु वार्डों में रहने के लिए या मुहताज खानों में बेगार करने के लिए उपयुक्त हैं, भारत में उसका सम्मान होता है और ब्राह्मणीय (वैदिक) विचारधारा के अनुसार आदरणीय है। उसके अनुसार वह एक ऐसा उच्च प्राणी है, जिसने ज्ञान प्राप्ति और देवता की अखंड आराधना के लिए जीवन के सभी प्रकार के भोग तथा मोह को त्याग दिया है।

भारत के उच्च वर्ग

पैरा 17 - जो वर्ग अब भी भारत के प्रभावशाली और उच्च वर्ग समझे जाते हैं, उनकी श्रेणियाँ इस प्रकार हैं :

प्रथम - जमींदार और जागीरदार, भूतपूर्व सामंतों के प्रतिनिधि और देशी शक्तियों के उच्च प्राधिकारी और वे जिन्हें क्षत्री वर्ग कहा जाता है।

द्वितीय - व्यापार या वाणिज्य से धन अर्जित करने वाले अथवा वैश्य वर्ग।

तृतीय - सरकार के उच्च कर्मचारी।

चतुर्थ - ब्राह्मण, उनके साथ भले ही लम्बे अंतराल के बाद रहे हों, उच्च जातियों के उन कातिबों या मुंशियों को जोड़ा जा सकता है, जो कलम का खाते हैं, यथा बंबई के प्रभु और सैनवी, बंगाल के कायस्थ बशर्ते कि शिक्षा या पद की दृष्टि से उनका रुतबा हो। ब्राह्मण सबसे अधिक प्रभावशाली

पैरा 18 - इन चार वर्गों में अतुलनीय दृष्टि से सर्वाधिक प्रभावशाली व अधिक संख्या में और कुल मिलाकर जो सबसे आसानी से सरकार द्वारा काम में लाया जा सकता है, वह है ब्राह्मण वर्ग। पूरे भारत में यह बात सर्वविदित है कि पुराने जागीरदार या क्षत्री वर्ग हमारे राज में बराबर पतनोन्मुख हैं। उनका पुराना व्यवसाय समाप्त हो गया है और उन्होंने नया व्यवसाय अपनाने में कोई रुचि या क्षमता नहीं दिखाई और शांति का पाठ नहीं पढ़ा। प्रेसिडेंसी में भूस्वामियों के इस अभिजात वर्ग को संबल देने के श्री एलफिंस्टोन और उनके उत्तराधिकारियों के प्रयत्न बुरी तरह विफल हुए। इस जाति के लिए नागरिक सम्मान तथा शिक्षा द्वारा उन्नति के द्वार खोलने के सभी प्रयासों पर भी पानी फिर गया। इस जाति को और कुछ भी नहीं सुहाता। वह तो झूठी शान - शौकत और फिजूलखर्ची में मस्त रहती है। वह तो हिन्दुस्तान के मैदानी इलाकों में अपने पूर्वजों की विजय - गाथा की यादों में खोई रहती है। ना ही कुछ अपवादों को छोड़कर वैश्य वर्ग में उच्च शिक्षा के प्रभाव के लिए बहुत बड़ा मार्ग खुल