ख. दलित जातियों की शिक्षा - Page 129

112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

  1. कहा जा सकता है कि बंबई प्रेसिडेंसी में ब्रिटिश शासन के दौरान 1815 में बंबई शिक्षा समिति की स्थापना शुरू हुई। इस समिति ने यूरोपियन बच्चों की शिक्षा के लिए अपने प्रयास जारी नहीं रखे। सूरत और थाणे में स्थानीय बच्चों को इस समिति के स्कूलों के लिए प्रोत्साहित किया गया और 1820 के प्रारंभ में बंबई में स्थानीय बच्चों के लिए चार पृथक स्कूल खोले गए। उनमें लगभग 250 विद्यार्थी थे। उसी साल अगस्त में स्थानीय बच्चों की शिक्षा के लिए और उपाय किए गए। स्थानीय भाषाओं में स्कूली पुस्तकें तैयार करने और स्थानीय स्कूलों की स्थापना या सहायता करने के लिए समिति ने एक विशेष समिति नियुक्त की। परन्तु शीघ्र यह महसूस किया गया कि इस प्रयास का व्यापक क्षेत्र मुख्यतः गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए स्थापित समिति के उद्देश्यों से परे है और 1922 में समिति एक पृथक निगम बन गई। तदुपरान्त इसका नाम बोंबे नेटिव स्कूल बुक एंड स्कूल सोसायटी रखा गया। बाद में 1827 में इसका नाम बदल कर बंबई नेटिव स्कूल सोसायटी कर दिया गया। माननीय माउंट स्टुअर्ट एलफिंस्टन इस नई सोसायटी के पहले प्रेसीडेंट थे। मुख्य न्यायाधिपति और बंबई सरकार की कार्यकारी परिषद् के तीन सदस्यों को वाइस प्रेसीडेंट बनाया गया और प्रबंध समिति में बारह यूरोपियन और बारह भारतीय सदस्य थे जिनमें कैप्टन जार्ज जेरबिस आर. ई. और सदाशिव काशीनाथ छत्रे को सचिव बनाया गया। सोसायटी ने अपना कार्य सरकार से मिलने वाले 600 रुपये प्रतिमाह के अनुदान से आरम्भ किया। 1825 तक बंबई सरकार ने भी अपने खर्चे से जिलों के कस्बों में प्राथमिक स्कूल खोले और उन्हें कलक्टर के अधीन रखा। 1840 में इन दो स्वतंत्र संस्थाओं की गतिविधियों में तालमेल रखने के लिए छह सदस्यों का शिक्षा बोर्ड बनाया गया, जिसमें तीन सदस्य सरकार द्वारा और तीन देसी नेटिव एजुकेशन सोसायटी द्वारा नियुक्त किए गए। यह बोर्ड 1855 में जन - शिक्षा के निदेशक की नियुक्ति तक शिक्षा विभाग का प्रभारी था।

  2. एक मार्च, 1856 को जब यह बोर्ड भंग हुआ, तो बंबई प्रेसिडेंसी में 15 अंग्रेजी कालेज और स्कूल थे, इनमें विद्यार्थियों की संख्या 2850 थी। वहां 256 वर्नाकुलर स्कूल थे जिनकी छात्र संख्या 18,888 थी। इसी रिपोर्ट में बोर्ड ने कहा है :

24 अगस्त, 1855 में अहमदनगर के कुछ निवासियों से एक याचिका प्राप्त हुई,

जिसमें छोटी जातियों की शिक्षा के लिए एक स्कूल की स्थापना करने का और

बाद में बनाए गए नए नियमों के अनुसार अध्यापकों को आधा वेतन देने का

अनुरोध किया गया था। याचिकादाताओं ने स्कूल के एक कमरे का निर्माण कर

लिया था और विद्यार्थियों की संख्या तीस बताई गई थी। इस प्रकार के स्कूल

की स्थापना समृद्ध और सवर्ण जातियों के पूर्वाग्रहों के आड़े आती थी और अल्प

वेतन पर अध्यापक के मिलने में कुछ कठिनाई अनुभव हो रही थी, परन्तु चूंकि

याचिका इस विषय पर बाद की अधिसूचना में दी गई शर्तों के अनुसार की गई