दलित वर्ग की शिक्षा
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थी, हमने अनुरोध को तुरन्त स्वीकार कर लिया और नवम्बर में स्कूल खोल दिया
गया। हमने विषय का मात्र उल्लेख किया है, क्योंकि यह पहला अवसर है कि
हमने इन जातियों के लिए स्कूल खोला है (मूल में नहीं)।
- बोर्ड के इस वक्तव्य से कि प्रेसिडेंसी में छोटी जातियों के लिए पहली बार स्कूल
खोला गया था, यह प्रश्न उठता है कि 1855 से पूर्व दलित जातियों की शिक्षा के बारे में ब्रिटिश सरकार की क्या नीति थी? इस प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व यह जरूरी है कि प्रेसिडेंसी में 1813 से 1855 के बीच की ब्रिटिश सरकार की शिक्षा नीति के इतिहास पर दृष्टिपात किया जाए। यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि पेशवा सरकार के दौरान दलित जातियां शिक्षा से पूरी तरह वंचित थी। राज्य शिक्षा के किसी भी विचार में वे शामिल नहीं थे। इसका कारण यह था कि पेशवा राज्य मनु के सिद्धान्तों पर आधारित धर्म - तंत्र राज्य था। उसके अनुसार शूद्रों और अतिशूद्रों को (शिक्षा विभाग की पिछड़ी जातियों के समकक्ष जातियां) जीवन स्वतंत्रता और संपत्ति का अधिकार भले ही रहा हो, किंन्तु शिक्षा का कोई अधिकार नहीं था। इतनी विवशताओं में जी रही दलित जातियों ने इस घृणित धर्मतंत्र के पतन पर राहत की सांस ली। ब्रिटिश शासन की स्थापना से दलित जातियों में उच्च आकांक्षाएं जगीं। पहली बात यह है कि यह एक लोकतंत्र था, जिसके बारे में वे सोचते थे कि इसमें कोई ऊंच - नीच नहीं है और सभी इंसान बराबर हैं। यदि लोकतंत्र अपने सिद्धान्तों पर सही अर्थों में चले, तो वह पेशवा के धर्मतंत्र के पूर्णतः विपरीत था। दूसरे, दलित जातियों ने देश को जीतने में अंग्रेजों का साथ दिया था और उन्हें सहज विश्वास था कि इसके बदले में अंग्रेज विशेष रूप से नहीं, तो कम से कम अन्य वर्गों के समान तो उनकी सहायता करेंगे ही।
- स्थानीय लोगों में शिक्षा का प्रसार करने के प्रश्न पर अंग्रेज लम्बे समय तक चुप्पी साधे रहे। हालांकि भारत के प्रशासन के उच्चाधिकारी भारत के लोगों में ज्ञान के प्रसार के अपने नैतिक दायित्व और उसकी प्रशासनिक आवश्यकता से पूरी तरह बेखबर नहीं थे, फिर भी 1813 तक सार्वजनिक रूप से सरकार के दायित्व के संबंध में कोई घोषणा नहीं की गई थी। 1813 में संविधि 53, जार्ज चतुर्थ अध्याय 155 की धारा 43 में संसद ने निर्णय दिया कि ‘‘भारत के राजस्व में से प्रति वर्ष एक लाख रुपये से अनधिक अलग रखा जाएगा, जो भारत के साहित्य में आवश्यक सुधार करने और यहां के विद्वानों को प्रोत्साहन देने तथा भारत में राज्य क्षेत्रों के निवासियों में विज्ञान की शिक्षा का प्रसार करने में व्यय किया जाएगा।’’ इस संविधि व्यवस्था के अंतर्गत कोई सुसंगत, सुदृढ़ और सुसंगठित प्रयास 1823 तक नहीं हुआ। क्योंकि कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने 3 जून, 1814 के पत्र में 1813 की संविधि की धारा 43 के कार्यान्वयन के तरीके को निर्धारित करते हुए गवर्नर जनरल इन काउंसिल को निदेश दिया था कि हिन्दुओं में संस्कृत की शिक्षा को बढ़ावा देने से उन उद्देश्यों की पूर्ति हो जाएगी जो संसद चाहती थी। परन्तु जब स्थानीय लोगों में शिक्षा को एक सुदृढ़ और सुसंगठित आधार प्रदान करने हेतु