120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
बल पर वे देशज प्रतिभा के लिए खुले सर्वोच्च पदों तक पहुंच सकेंगे और कोई बाधा उनकी इस इच्छा को दबा नहीं सकेगी। वे जज बन सकेंगे, ग्रांड जूरी और साम्राज्ञी के शांति - कमीशन के सदस्य बन सकेंगे। अनेक उदार लोगों का विचार है कि ब्रिटिश सरकार के भीतर यह तो अनुदारता और निर्बलता की पराकाष्ठा है कि वह इन पूर्वाग्रहों के आगे झुक जाए कि ऐसी नियुक्तियां, तो हिन्दू समाज के भीतर कुंठा पैदा करेंगी। अतः जाति के बंधनों पर खुला प्रहार किया जाना चाहिए।
पैरा 23 - माउंट स्टुअर्ट लेकिन प्रस्तुत है भारत के पक्षधर तथा अति एलफिंस्टन के विवेकपूर्ण उदारमना तथा विशाल हृदय प्रशासक श्री एलफिंस्टन
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विचारों का उद्धरण के विवेकपूर्ण विचार जो सही कार्यप्रणाली की ओर विचारों का उद्धरण
संकेत करते हैं। वह कहते हैं, ‘‘देखा गया है कि मिशनरी लोगों को निम्नतम जाति के छात्र सर्वोत्तम लगते हैं, लेकिन हमें इस बारे में सतर्क रहना ही होगा कि हम उस जाति के लोगों को कोई विशेष प्रोत्साहन किस प्रकार प्रदान करते हैं। वे न केवल अति हेय हैं, बल्कि वे समाज के बड़े - बड़े विभाजनों के अति अल्पसंख्या वाले लोगों में से हैं। आशंका है कि यदि हमारी शिक्षा प्रणाली ने सबसे पहले अपनी जड़ें उनके भीतर जमाईं, तो वह कभी और विकास नहीं करेंगी। हमारे सामने एक ऐसा वर्ग आ सकता है, जो उपयोगी ज्ञान में तो शेष से बेहतर होगा पर वह उन जातियों की घृणा का पात्र हो जाएगा, जिन्हें हम नई उपलब्धियों वाले वर्ग से हीन समझने लगेंगे। ऐसी स्थिति वांछनीय होगी, जब यदि हम इसी पर संतोष कर लें कि हम अपनी शक्ति का आधार अपनी सेना या आबादी के एक हिस्से की कुर्की को बना लें, लेकिन उसके हर ऐसे प्रयास से कोई मेल नहीं खाता, जो और अधिक व्यापक आधार पर टिका हो।’’
इस तरह यह स्पष्ट है कि 1855 तक बंबई प्रेसिडेंसी में यदि दलित जातियों के लिए कोई स्कूल नहीं खोले गए, तो यह अंग्रेज सरकार की सोची समझी नीति थी कि शिक्षा की सुविधा उच्च जातियों के गरीबों विशेष रूप से ब्राह्मणों तक ही सीमित रखी जाए। यह दूसरी बात है कि यह नीति सही थी या गलत। सच्चाई यह है कि इस अवधि में सरकार ने दलित जातियों को शिक्षा के लाभ से वंचित रखा।
कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने अपने 19 जुलाई, 1854 के पत्र संख्या 49 में टिप्पणी की कि ‘‘अब हमारा ध्यान संभवतः एक बात की ओर जाना चाहिए, जो कि अभी भी अधिक महत्वपूर्ण है और जिसको हमें स्वीकार करना होगा। अभी तक बहुत उपेक्षा की गई अर्थात् जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के लिए आवश्यक उपयोगी और व्यावहारिक ज्ञान किस प्रकार उन लोगों तक पहुँचाया जाए, जो अपने प्रयत्नों से शिक्षा प्राप्त करने में सर्वथा अक्षम हैं और हम चाहेंगे कि इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु विशेष प्रयास करें, जिसके