ग. दलित जातियों के हितों की रक्षा - Page 153

136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

I. पर्याप्त प्रतिनिधित्व के माध्यम से संरक्षण

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  1. आरंभिक : सांविधिक आयोग में किसी भारतीय को नियुक्त न करने के संसद
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के फैसले से सभा को बड़ी राहत मिली है। यदि आयोग भारतीयों की स्वराज की मांग पर विचार करता तो किसी भारतीय की नियुक्ति के लिए आंदोलन उचित होता, परन्तु तथ्य यह है कि आयोग को देश के विभिन्न हितों की एक ही नहीं, बल्कि अनेक मांगों पर विचार करना होगा। ऐसी स्थिति में आयोग में सभी ऐसे हितों को प्रतिनिधित्व दिए जाने के लिए आंदोलन होना चाहिए था। सभा यह बताना चाहती है कि दलित जातियां तभी संतुष्ट होंगी जब सांविधिक आयोग मे ंउनके प्रतिनिधि सहित विभिन्न हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले भारतीयों को नियुक्त किया जाए। लेकिन सांविधिक आयोग में प्रतिनिधित्व की मांग ऐसी नहीं थी, इसलिए सभा उन लोगों से सहमत नहीं हुई, जिन्होंने इस मांग के लिए आग्रह किया था। यह सत्य है कि सभा को आयोग में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के लिए जितना अपने विचारों के अनुसार विरोध करना चाहिए था, उतना उसने नहीं किया। परन्तु इसका कारण यह था कि सभा ने यह महसूस किया कि इस देश में जहां वाइसराय से लेकर नीचे तक के अधिकारियों की यह आदत हो गई है कि वे मुट्ठी भर शोर मचाने वाले लोगों की बात तो सुनें और सिर झुकाए जुल्म सहने वाले करोड़ों लोगों की परवाह न करें, वहां इसकी अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती। बर्क के शब्दों में, चूंकि हरियाली में टिड्डों की तरह आधे दर्जन राजनीतिज्ञ अपने दुराग्रही इंकार से अपनी ओर सबका ध्यान आकर्षित कर लेते हैं, जबकि अधिसंख्य लोग एक बड़े से शाह बलूत के पेड़ तले बैठे हजारों मूक पशुओं की तरह शांत भाव से जुगाली करते रहते हैं और भारत सरकार सोचती है कि हायतौबा मचाने वाले ये राजनेता ही यहां के प्रतिनिधि हैं। इनकी संख्या भी काफी होती है, परन्तु ये नन्हें, दुबले - पतले, फुदकने वाले कीड़ों से भिन्न होते हैं, पर शोर मचाने वाले और उपद्रवी कीड़े होते हैं। परन्तु सभा का अपने विचारों के लिए आग्रह न करने का एक और कारण भी है। सभा की राय में सांविधिक आयोग में भारतीयों को शामिल न करना दलित जातियों पर कोई मामूली अनुकंपा नहीं की गई है। दलित जातियों को शामिल न किए जाने के कारण वह उस पूर्वाग्रह से बच गई है, जिसका उनके मामले पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता। सभा ने उनके मामले को आयोग के समक्ष रखने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है।

  1. 1919 में दलितों के साथ हुआ अन्याय : मोंटेग्यू - चैम्सफोर्ड रिपोर्ट (पैरा 151) में पूरी तरह स्वीकार किया गया कि सामाजिक विषमताओं और विभाजनों का होना भारतीय समाज का एक ऐसा निराला लक्षण है, जिसका उन विचारों के साथ तालमेल नहीं बैठता जिन पर विश्व में अन्यत्र प्रतिनिधि संस्थाएं टिकी हैं। रिपोर्ट तैयार करने वालों की मान्यता है (पैरा 153) कि ‘‘उन्हें हमें एक ऐसा मार्ग दिखाना होगा कि हम