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दलित जातियों के हितों की रक्षा

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अन्यत्र प्रचलित लोक प्रशासन की प्रणालियों का तालमेल भारतीय जीवन की विशेष परिस्थितियों से बिठा सकें।’’ रिपोर्ट तैयार करने वालों ने सुधारों का कड़ा विरोध करने वाली दलित जातियों को शांत करने के लिए उनके हितों की रक्षा का उपाय किया जैसा कि उनकी रिपोर्ट के पैरा 155 में दिए गए निम्नलिखित वक्तव्य से स्पष्ट हो जाएगा। उसमें कहा गया है : ‘‘हमने दर्शाया है कि रैयत की राजनीतिक शिक्षा का काम तेजी से नहीं हो सकता और इसमें बहुत कठिनाइयां हो सकती हैं। जब तक यह काम पूरा नहीं होता, तब तक यह भय बना रहेगा कि, जो उससे बलवान और चतुर होंगे, वे उस पर अत्याचार करेंगे और जब तक कि यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि उसके हितों को उसके हाथों में निरापद रूप से छोड़ा जा सके अथवा विधायिका उसके प्रतिनिधित्व और हितों पर विचार न करे, तब तक उसकी रक्षा के लिए हम सत्ता अपने हाथों में रखें। इस तरह दलित जातियों के बारे में हमारा इरादा यह है कि हम उनके प्रतिनिधित्व के लिए यथासंभव सर्वोत्तम व्यवस्था करें, ताकि वे भी अंततोगत्वा आत्मरक्षा का पाठ सीख सकें। परन्तु यदि ऐसा पाया जाता है कि उनके हितों को आघात पहुंचता है और सामान्य प्रगति का लाभ उन्हें नहीं मिलता तो हमें उनकी सहायता हेतु साधनों को अपने अधिकार में रखना ही होगा . . . ।’’

  1. सभा को खेद है कि साउथबरो कमेटी ने इन वायदों की घोर अवहेलना की, जब कि बाद में उसकी नियुक्ति इसलिए की गई थी कि वह मताधिकार प्रणाली की

खोज करे, निर्वाचन - क्षेत्रों का गठन करे और इस बारे में सिफारिश करे कि भारत में प्रचलित विशिष्ट सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखने में प्रस्ताविक लोक प्रशासन की प्रणाली में क्या - क्या समंजन करने होंगे। साऊथबरो कमेटी दलितों के हितों की रक्षा के लिए समुचित उपाय सुझाने की समस्या के प्रति इतनी घोर उदासीन थी कि भारत सरकार को भी, जो इस मामले में खास दिलचस्पी नहीं रखती थी, साऊथबरो कमेटी की रिपोर्ट पर अपने डिस्पैच के पैरा 13 में कहना पड़ा : ‘‘हम (गैर - सरकारी मनोनयन पर) प्रस्ताव को सामान्यतः स्वीकार करते हैं, परन्तु एक जाति ऐसी है, जिसके मामले में हमें लगता है कि हमें उसकी ओर कमेटी में अधिक ध्यान देना चाहिए। भारतीय संवैधानिक सुधार संबंधी रिपोर्ट में दलित वर्गों की समस्याओं को स्पष्ट मान्यता दी गई है और सुधारों को लागू करने की प्रतिज्ञा की गई है। कमेटी की रिपोर्ट में जिन जातियों को हिन्दू - अन्य कहा गया है, भले ही उनकी व्याख्या अलग - अलग तरीके से की गई है, पर मोटे तौर पर वे एक ही प्रकार की जातियां हैं। उनके बहिष्कार में कठोरता में अंतर को छोड़कर उनकी स्थिति कमोवेश मद्रास के पंचमाओं जैसी है। निश्चित रूप से वे उस हिन्दू समाज के अंग नहीं हैं, जिन्हें उनके मंदिरों में प्रवेश की अनुमति दी जाती है। वे कुल आबादी का लगभग पांचवा भाग हैं और मार्ले - मिंटो काउंसिल में उन्हें कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। कमेटी की रिपोर्ट में दलित जातियों का दो बार उल्लेख हुआ है, परन्तु केवल यह बताने के लिए कि उनके मतदाताओं की संख्या संतोषजनक न होने के कारण उनके लिए मनोनयन की व्यवस्था की गई है। इसमें इन लोगों की दशा तथा अपनी देखभाल स्वयं कर पाने की उनकी क्षमता के