ग. दलित जातियों के हितों की रक्षा - Page 160

दलित जातियों के हितों की रक्षा

निर्वाचन-क्षेत्र कुल सीटें दलित मराठों और

जातियों संबद्ध जातियों

के लिए के लिए

आरक्षित आरक्षित विशेष

  1. श्रमिक संघ 4

  2. विश्वविद्यालय 2

  3. यूरोपीय 4

  4. मिलमालिक 1

  5. वाणिज्य 1

  6. कृषि 1

  7. इनामदार और जागीरदार 2

  8. अधिकारी 9

योग 24

कुल योग 140

परिषद् की यह कुल सदस्य संख्या रहे।

143

  1. दोनों मामलों में 140 सदस्यों की परिषद् में दलितों के 22 प्रतिनिधियों की मांग सभा ने की है। सभा यह जोर देकर कहना चाहती है कि 140 की परिषद् में दलितों का यह प्रतिनिधित्व न्यायोचित है। सभा इससे अवगत है कि कुछ लोग कह सकते हैं कि यह मांग बहुत ज्यादा है। इस बात को दलित जातियों के प्रति पूर्वाग्रह ही समझा जाना चाहिए। उसके बारे में नहीं कहा जा सकता कि उसका कोई निश्चित आधार है। सभा का विचार है कि दलितों की संख्या का सही आकलन इस प्रकार के विचारों की भ्रांति दूर करने का सही आधार होगा क्योंकि यह स्वीकार किया ही जाना चाहिए कि जनसंख्या ही ऐसा एक मापदंड है, जिसके आधार पर किसी समुदाय का प्रतिनिधित्व निश्चय किया जा सकता है। अतः दलितों की सही संख्या की गणना विशेष महत्व का मामला है। 1919 में बंबई प्रेसिडेंसी के दलितों को साऊथबरो कमेटी का अन्याय सहना पड़ा है। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बिल्कुल गलत आंकड़े दिए हैं। [*] यह एक ऐसा आंकड़ा है, जो 1911 की जनगणना के अनुसार नितांत अप्रमाणिक

* साऊथबरो कमेटी द्वारा दिए गए जो आंकड़े भारत सरकार द्वारा स्वीकार कर लिए गए, उनकी संख्या उपरोक्त तालिका

में वर्णित है, जो 577516 है। साऊथबरो कमेटी ने जिस प्राधिकार को प्रमाण माना, उसके हिसाब से 1911 में दलित

वर्गों की संख्या 2145208 थी।