ग. दलित जातियों के हितों की रक्षा - Page 161

144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

है। साऊथबरो कमेटी ने दलित वर्गों की, जो संख्या दर्शायी, वह इतनी अल्प थी कि भारत सरकार का यह नगण्य सुझाव भी निष्प्रभावी रहा कि बंबई विधान परिषद् में दलित वर्गों के दो प्रतिनिधि हों। दलित जातियों की संख्या को कम करके दिखाने के लिए वैसे ही प्रयत्न अब उत्तरदायी क्षेत्रों में किए जा रहे हैं। उदाहरणार्थ 23 फरवरी, 1928 को भारत सरकार की ओर से विधान सभा में बोलते हुए श्री वाजपेयी ने कहाः ‘‘भारत में दलित वर्गों की संख्या बहुत बढ़ा - चढ़ाकर बताई गई है। जैसा कि अब तक कहा जा रहा है, उनकी संख्या 6 करोड़ नहीं है, बल्कि वास्तव में 2 करेड़ 85 लाख है।’’ सभा को आशंका है कि आयोग भी साऊथबरो कमेटी जैसी भूल का शिकार हो सकता है और उसके फलस्वरूप ऐसे प्रस्ताव रख सकता है, जो गलत गणना पर आधारित हों। इसलिए सभा आयोग का ध्यान इस संबंध में भारत के जनगणना निदेशक के कथन की ओर दिलाना चाहती है। 1921 की भारत की जनगणना के पहले खंड के अध्याय XI में निदेशक ने कहा है : ‘‘पैरा 193 - पिछले कुछ वर्षों के दौरान समाज के एक कतिपय वर्ग को ‘दलित वर्ग’ कहा जा रहा है। जहां तक मुझे मालूम है, इस शब्द की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। ना ही यह निश्चित है कि इसमें कौन आते हैं।’’ शिक्षा - प्रगति की 1912 से 1917 तक की पंचवर्षीय समीक्षा में (अध्याय 18, पैरा 505) दलित जातियों के संबंध में शैक्षिक सहायता और प्रगति की दृष्टि से विशेषतः विचार किया गया है और रिपोर्ट के 13वें परिशिष्ट में समाज के इस वर्ग में आने वाली जातियों और जनजातियों की एक सूची दी गई है। इस सूची के अनुसार दलित जातियों की कुल आबादी तीन करोड़ दस लाख अथवा ब्रिटिश भारत की पूरी हिन्दू और जनजातीय आबादी का 19 प्रतिशत बैठती है। किसी सार्वजनिक रिपोर्ट में सामाजिक भेदभाव के उल्लेख से नाराजगी पैदा होने की आशंका है और उसे द्वेषमूलक समझा जा सकता है, परन्तु क्योंकि सूचियां पहले ही तैयार कर ली गई हैं और यह तथ्य है कि दलितों ने विशेष रूप से दक्षिण भारत में वर्ग चेतना और वर्ग संगठन प्राप्त कर लिया है और परोपकारी संस्थाओं द्वारा गठित विशेष मिशन उनकी सेवा करते हैं और सरकारी तौर पर उन्हें प्रतिनिधित्व दिया गया है, अतः निश्चय ही यह उचित दीख पड़ता है कि तथ्यों का सामना किया जाए और उनकी संख्या के बारे में कोई निश्चित आंकड़े प्राप्त किए जाएं। इसलिए मैंने प्रांतीय अधीक्षकों से कहा है कि वे मुझे जनगणना के आंकड़ों पर आधारित उन जातियों की अनुमानित संख्या बताएं जिनका समावेश सामान्यतः ‘दलित’ की श्रेणी में किया गया था। संयुक्त प्रांत के सरकारी कर्मचारियों के दायित्व की भावना तो इतनी ज्यादा नजाकत भरी थी कि वह एक मोटे अनुमान के प्रयास को भी वहन नहीं कर सकी। जो आंकड़े दिए गए हैं, वे एक निश्चित समान मापदंड पर नहीं दिए गए हैं, क्योंकि भारत के भिन्न - भिन्न भागों में एक ही वर्ग के विषय में भिन्न - भिन्न नीति अपनाई गई है और मुझे कुछ मामलों में 1911 की रिपोर्ट और सारणियों से प्राप्त सूचना और शिक्षा संबंधी रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के आधार पर अनुमान में संशोधन करना पड़ा है। वह सामान्य त्रुटि भी