दलित वर्गों संबंधी भारतीय मताधिकार कमेटी
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समावेश है, जो वास्तव में अस्पृश्य नहीं हैं। दूसरे वह यह धारणा पैदा करता है कि दलित वर्ग एक निम्न और असहाय समुदाय है, जब कि वास्तविकता यह है कि हर प्रांत में उनमें से अनेक सुसम्पन्न और सुशिक्षित लोग हैं और समूचे समुदाय में अपनी आवश्यकताओं के प्रति चेतना जागृत कर रहे हैं। उसके मानस में भारतीय समाज में सम्मानजनक दर्जा प्राप्त करने की प्रबल लालसा पैदा हो गई है और वह उसे प्राप्त करने के लिए भागीरथ प्रयास कर रहा है। इन सब कारणों के आधार पर ‘दलित वर्ग’ शब्द अनुपयुक्त और अनुचित है। असम के जनगणना अधीक्षक श्री मुल्लान ने अस्पृश्यों के लिए ‘बाह्य जातियां’ नामक नये शब्द का प्रयोग किया है। इस बोध नाम के अनेक लाभ हैं। यह उन अस्पृश्यों की स्थिति की सही व्याख्या करता है जो हिन्दू धर्म के भीतर तो हैं लेकिन हिन्दू समाज से बाहर हैं और वह उसका विभेद उन हिन्दुओं से करता है, जो आर्थिक और शैक्षिक दृष्टि से दलित तो हैं - लेकिन हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज दोनों की परिधि के भीतर हैं। इस शब्द के दो अन्य लाभ हैं दलित वर्ग जैसे अनिश्चित शब्द के प्रयोग से इस समय, जो समूचा भ्रम जाल फैला हुआ है वह तो ‘बाह्य जाति’ के प्रयोग से दूर होता ही है पर साथ ही साथ वह भोंडा भी नहीं है। हमारी कमेटी का विचार है कि वह इस संबंध में सिफारिश करने का अधिकार नहीं रखती, लेकिन दलित वर्गों के प्रतिनिधि के नाते मैं बिना किसी संकोच के कह सकता हूँ कि जब तक कोई और बेहतर नाम न मिल जाए, तब तक अस्पृश्य वर्गों को अधिक व्यापक शब्द ‘बाह्य जातियों’ या ‘बहिष्कृत जातियों’ के नाम से पुकारा जाए, न कि दलित वर्गों के नाम से।
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- इस टिप्पण को समाप्त करने से पूर्व मैं अपनी ओर से उसी आरक्षण की मांग करना चाहूंगा, जिसकी मांग कमेटी के मेरे मुस्लिम साथियों ने की है अर्थात् गोलमेज सम्मेलन में प्रस्तुत अल्पसंख्यकों संबंधी समझौते में दलित वर्गों ने सीटों के जिस अनुपात की मांग की है, उस पर श्रमिक महिलाओं तथा अन्य विशेष हितों के लिए सीटों के आवंटन का कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा।
1 मई, 1932 डॉ. भीमराव अम्बेडकर
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