216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
- बंगाल के दलित वर्गों के बारे में एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है और मैं उसकी
ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा। उससे पता चलता है कि 1911 की बंगाल की जनगणना
में जो सूची दी गई है, वह उन जातियों का सही आंकलन है, जिन्हें बंगाल में परंपरा
से अस्पृश्य जातियां माना जाता रहा है। मैं 1809 के विनियम 4 की धारा 7 का
उल्लेख करता हूँ। (यह विनियम 1806 के विनियम 4 और 5 को रद्द करने के लिए
था और उसका उद्देश्य था कि उक्त विनियमों के नियमों के स्थान पर नये नियम
रखे जाएं। उक्त विनियमों का संबंध जगन्नाथ की यात्रा करने वाले यात्रियों पर शुल्क
लगाने और मंदिर के कामकाज के अधीक्षण और प्रबंध से था। इसे गवर्नर जनरल -
इन - काउंसिल ने 28 अप्रैल, 1809 को पारित किया था।) उक्त धारा में उन जातियों
की सूची दी गई है, जो पुरी के जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकती थीं :
(1) लोली अथवा काशी, (2) कलाल अथवा सुनरी, (3) मछुवा, (4) नाम शूद्र अथवा
चांडाल, (5) घुस्की, (6) गजूर, (7) बागड़ी, (8) जोगी अथवा नूरबाफ, (9) कहार -
बौरी और दुलिया, (10) राजवंसी, (11) पिराली, (12) चमार, (13) डोम, (14) पान,
(15) तिपारू, (16) भुईन्नली, (17) हरि।
यह आंकलन 1911 की जनगणना की सूची से मेल खाता है। अतः वह उसकी
शुद्धता को समर्थन प्रदान करता है। प्रसंगतः इससे पता चलता है कि 100 वर्ष की
अवधि में भी बंगाल के अस्पृश्यों के सामाजिक दर्जे में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
- संयुक्त प्रांत, बंगाल और पंजाब में दलित वर्गों की संख्या के बारे में सहमति
नहीं है। इन तीन प्रांतों के संबंध में मैं इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ
कि जहां भारतीय मताधिकार कमेटी ने अस्पृश्यों की संख्या के निर्धारण के लिए दो
अलग कसौटियों को आधार माना है, वहां जाहिर है कि प्रांतीय सरकारों और प्रांतीय
कमेटियों ने एक ही कसौटी यानी स्पर्श द्वारा अपवित्रीकरण की कसौटी का अनुसरण
किया है।
- संविधान में प्रस्तावित परिवर्तनों के फलस्वरूप मतदाता सूचियों में जो संशोधन
हो रहा है, वह इस प्रश्न पर विचार के लिए एक अति उत्तम अवसर है कि दलित
वर्गों का एक उचित और उपयुक्त नामकरण किया जाए। अतः मैं इस प्रश्न पर अपनी
राय व्यक्त करना चाहता हूँ। जिन जातियों को इस समय ‘दलित वर्ग’ कहा जाता
है, उन्हें इस शब्द के प्रयोग पर काफी आपत्ति है। कमेटी के सामने जो अनेक साक्षी
उपस्थित हुए हैं, उन्होंने इस भावना को व्यक्त किया है। इसके अलावा दलित वर्ग शब्द
ने जनगणना में काफी संभ्रम पैदा करा दिया है, क्योंकि इसमें उन दूसरे लोगों का भी