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सार्वजनिक फंड का सही उपयोग करें

दिनांक 14 जुलाई, 1952 को मुंबई के दामोदर हॉल में अस्पृश्य कार्यकर्ताओं का सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस अवसर पर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा-

बहनों और भाइयों,

आपको यहां आमंत्रित किया गया है, क्योंकि 1938 में मुंबई में मेरे द्वारा स्थापित किया गया इमारत फंड के बारे में आपको जानकारी दी जा सके। आगे क्या किया जा सकता है यह भी तय किया जा सकता है इसलिए वह सभा बुलाई गई है। 1938 में इमारत फंड की स्थापना करने के बाद हर चॉल में इसका प्रचार-प्रसार किया गया। आज 14 सालों के बाद अस्पृश्य बंधुओं के लिए बनने वाली इमारत को कोई मूर्त रूप नहीं मिल पाया है। इसके कई कारण हैं। हालांकि प्रमुख कारण यही है कि 1942 में, मैं मुंबई छोड़ कर दिल्ली चला गया था। मेरी अनुपस्थिति में फंड का काम जोरों से नहीं चला। असल में, मेरे न होने पर काम रुक जाए यह अच्छी बात नहीं है। लेकिन यही हुआ है यह बात सच है। मेरी अनुपस्थिति में पिछले दस सालों में लोगों के मन में कई तरह के शक पैदा हुए। इमारत फंड का क्या हुआ? या आगे क्या होगा? इस बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी। अब मैं आपको कुछ आंकड़े बताऊंगा। उससे पता चलेगा कि इमारत फंड का काम बंद नहीं हुआ था, लेकिन चुपचाप चल ही रहा था। मेरी राय में, अब तक इस फंड में काफी रकम जुड़ गई है। रकम इतनी है कि आप सोच भी नहीं सकते।

आज इस इमारत फंड में 1,11,228 रु. 4 आना और तीन पैसे जमा हुए हैं। अस्पृश्य समाज के इतिहास में इतनी बड़ी रकम जुटने का यह पहला अवसर है। एक लाख ग्यारह हजार दो सौ अठ्ठाइस रुपया चार आना और तीन पैसे। इसमें हम लोगों द्वारा दी गई रकम केवल 31709 रुपए 4 आना (इकत्तीस हजार सात सौ नौ रुपया चार आना) ही है। बाकी 75500 रुपया (पिचहत्तर हजार पांच सौ) रुपयों की रकम मैंने ऊंची जाति के अपने दोस्तों से इकठ्ठा की है। इसमें से 36535 रुपए की रकम जगह खरीदने के लिए

खर्च हुई है। हालांकि, आज अगर वह जगह बेचने जाएं तो डेढ़ लाख रुपए कोई भी दे देगा इतनी वह जगह महत्वपूर्ण है। इस रकम में से एक और बड़ा खर्च हुआ। प्रेस की इमारत बनाने के लिए 35000 रुपए खर्च हुए। इन दोनों बातों के लिए कुल 71525 रुपए

जनताः 19 जुलाई, 1952