270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
खर्च हुए हैं और 39693 रुपए 4 आना 3 पैसे की रकम इंपीरियल बैंक में बाकी बची है। अपने लोगों द्वारा जो रकम दी गई है उसमें से अलग-अलग जगहों से लोगों द्वारा, संस्थाओं द्वारा 25 रुपए या उससे अधिक रकम दी है ऐसे 25709 रुपए और 4 आने की रकम है। 25 रुपयों से कम रकम देने वालों की कुल 1000 रुपयों की रकम जमा है तथा जिसके बारे में कोई जानकारी नहीं है ऐसी 5000 रुपयों की रकम है। इन राशियों के बारे में जानकारी क्यों नहीं मिली? तो वह इसलिए कि, लोग जो रसीद-पुस्तक लेकर गए थे, उसे उन्होंने जमा नहीं किया। इसीलिए जानकारी मिल नहीं पाई। हो सकता है उन रसीद बुकों में और रकम जमा हुई हो और यह अधिक रकम लोग खा गए, इस प्रकार की भावना होना स्वाभाविक है। इस शक को दूर करने के लिए लोग जो रसीद बुक (पावती पुस्तक) लेकर गए हैं और जिन्होंने वे लौटाई नहीं हैं वे इकठ्ठा रकम के साथ उसे लौटा दें। पुस्तक न लौटाना या रकम न लौटाना धोखाधड़ी है और ऐसी धोखाधड़ी को कानून ने अपराध माना है, यह बात सब लोग ध्यान में रखें।
अब इस फंड का इस्तेमाल मुंबई में एक हॉल बनाने का मेरा विचार है। इस हॉल से जो आमदनी होगी उससे हम अपने छात्रों की पढ़ाई के खर्च का इंतजाम कर सकते हैं या और लोगों के हित के काम किए जा सकते हैं। इसी साल में या अगले साल तक हॉल बनकर तैयार हो जाना चाहिए।
इस हॉल को बनाने के लिए हमें पौने दो लाख रुपये कुल खर्च आएगा ऐसा अंदाजा है। आज इंम्पिरियल बैंक के हमारे खाते में 39,693 रुपये, 4 आना और 3 पैसा इसकी रकम है। फिलहाल इमारत की जमीन हमने कुछ लोगों को किराये पर दी है, जब हम उस जगह हॉल बनाने की सोचें, तब उनको नगद खाली करने के लिए नोटिस देना पड़ेगा। इससे हमारी किराये से मिलने वाली आमदनी बंद हो जाएगी।
जानकारों के अनुसार हॉल बनाने के लिए एक लाख रुपयों का खर्चा आएगा तथा हॉल में फर्नीचर आदि चीजें लगवाने में पौना लाख रुपयों का खर्च आएगा। हो सकता है थोड़ी कम या थोड़ी अधिक रकम खर्च हो।
इतनी बड़ी रकम कैसे जुटाई जाए यह एक समस्या है। मुझे अपने 60वें जन्मदिन पर 60000 रुपए देना लोगों ने तय किया है। उसमें अब तक करीब 11-12 हजार रुपए इकठ्ठा हुए हैं ऐसा सुनने में आया है। हीरक महोत्सव की प्रतिज्ञा आप लोगों ने की है उसे पूरी करने की इच्छा आपको पूरी करनी चाहिए। वरना ये केवल हवाई किला होकर रह जाएंगे। ऐसा नहीं होना चाहिए। 12 हजार रुपए आप लोगों ने इकठ्ठे किए हैं और बाकी के 48 हजार रुपए भी आप लोगों को इकठ्ठे कर लेने चाहिए। आप अगर मुझे 60 हजार रुपए देंगे तो मैं वे अपनी जेब में डाल कर ले नहीं जाऊंगा। मैं वे हॉल बनने के लिए ही दूंगा। मेरे जीते जी हॉल का काम होना चाहिए ऐसी मेरी बहुत इच्छा है।