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अल्पसंख्यकों को समझना ही चाहिए, अधिकार के
नाम पर उन पर अत्याचार न करें
भारत सरकार के विधि मंत्री और भारतीय अस्पृश्यों के महान नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर हाल ही में मुंबई आए थे। उस दौरान मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज में दिनांक 10 अक्तूबर, 1947 के दिन उन्होंने छात्रों को मार्गदर्शन करते हुए विद्वतापर्ण भाषण दिया। उन्होंने कहा -
अध्यक्ष महोदय और सभागृह में उपस्थित सदस्यों,
इस महत्वपूर्ण अवसर के लिए योग्य भाषण तैयार करने के लिए जितना समय देना जरूरी था उतना देना मेरे लिए लगभग असंभव था, इसका मुझे खेद है। क्योंकि यह समय देश के राजनीतिक जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अब तक हम में से ज्यादातर छात्र राजनीतिक आंदोलनों की ओर ध्यान देने लगे हैं यह सही है, लेकिन उसे राजनीति क्या है, राजनीति में क्या जिम्मेदारियां उठानी पड़ती हैं और राजनीतिक मामलों में सफलता पाने के लिए किन मार्गों को अपनाना पड़ता है इसका वास्तविक अहसास नहीं है। विश्वविद्यालयीन जीवन, जीवन के असली सवाल और राजनीति में कोई मेल नहीं था। आप जब कहते हैं कि हमने जीवन के एक नए क्षेत्र में प्रवेश किया है तब मुझे आपसे यह उम्मीद होती है कि आपने इस कॉलेज के छात्रों की पार्लियामेंट की स्थापना की है और उसके जरिए आपको जो बातें हासिल करनी हैं वे हैं -
अपने मन का विकास, उद्देश्य को विस्तार देना, सोचने की क्षमता बढ़ाना, कठिन सवालों को सुलझाने की अपनी शक्ति बढ़ाना।
इस प्रकार आपको प्राप्त शक्ति, योग्यता, लक्ष्य, ताकत का इस्तेमाल इस देश की जनता के सामने उपस्थित विकराल समस्याओं को हल करने के लिए करना।
और यह कोई आसान बात नहीं है। पढाई के कमरे में आराम से बैठकर अथवा विज्ञान की प्रयोगशाला में बैठे-बैठे ऐसे सवाल हल नहीं हुआ करते। ये काम उतने आसान नहीं हैं। इनको हल करने के लिए इससे अधिक कुछ करने की जरूरत होती है। आप यहां राजनीति विज्ञान, इतिहास, व्यापार, आयात-निर्यात, मुद्रा और हम लोगों के
गरुड़ः 26 अक्तूबर और 2 नवंबर, 1947