66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जीवन में महत्वपूर्ण जगह ले चुके जो अन्य विषय हैं, केवल उन्हीं का अध्ययन नहीं करने वाले हैं, बल्कि, जो ज्ञान आप पाएंगे उसके सहारे आप न केवल अपने आपको, बल्कि इस देश का सफल नेतृत्व करने वाले राजनीतिज्ञों की भी मुश्किल समस्याएं हल करने में मदद करने वाले हैं। उनसे कहां गलतियां हो रही हैं, यह आप बताएंगे। इसीलिए मैं कहता हूं कि कम से कम इस कॉलेज के छात्र - और मैं ऐसी उम्मीद करते हैं कि पूरे भारत के न सही, इसी इलाके के अन्य कॉलेजों के छात्र भी - आज एक नई दिशा की ओर बढ़ रहे हैं।
मुझे यकीन है कि आप इस पार्लियामेंट को केवल मनोरंजन का साधन नहीं समझेंगे। कुछ युवाओं को अति उत्साह में लगता होगा कि किसी की बुराई करने या हंसी-मजाक उड़ाने के लिए यह जगह अच्छी है, लेकिन वे ऐसा न समझें। मैं उम्मीद करता हूं कि इस जगह के महत्व को आप समझें और उतनी ही गंभीरता से उसमें हिस्सा लें। और, मैं यह उम्मीद भी करता हूं कि, इस सभागृह में सरकार के सदस्य और विपक्ष के नेताओं के बीच ही नहीं तो सभी सदस्यों के बीच उपस्थित किए गए सवालों पर अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार अध्ययनपूर्ण बहस हो।
इसके अलावा एक और बात का ध्यान आपको रखना होगा और वह बात है कि तानाशाही शासनप्रणाली में नौकरशाही या राजा के मतानुसार कानून बनाए जाते हैं और ऐसी जगहों पर बोलना अनावश्यक हो जाता है। सत्ताधीश हो या नौकरशाह हो उन्हें किसी के बोलने की ओर ध्यान देने की जरूरत नहीं होती क्योंकि उनकी इच्छा ही कानून होता है। लेकिन पार्लियामेंट में कानून बनाए जाते हैं और ये कानून भले लोगों की इच्छा के अनुसार ही बनाए जाते हैं लेकिन जिसके पास विपक्ष को अपनी तरफ खींच लेने की कला होती है वही अपने विरोधी मतों पर विजय भी पा सकता है। इस सभागृह में जो आपके विलाफ हैं उनके साथ मारपीट करके आप जीत हासिल नहीं कर सकते। इसी प्रकार अल्पसंख्यक लोग गुंडों को लाकर बहुसंख्यकों पर दबाव नहीं बना सकते। बहुसंख्यक भी अल्पसंख्यकों के साथ मारपीट नहीं कर सकते। इस सभागृह में जिन्हें अपनी बात मनवानी होती है वे केवल अपनी वाकपटुता के बलबूते पर ही मनवा सकते है। अपने विरोधियों को उसे बहस के जरिए ही अपनी ओर कर लेना होता है। बहस भले सौम्य हो या तेज, लेकिन हमेशा वह तर्क और विचारशील होनी चाहिए। इसीलिए, पार्लियामेंट जैसी संस्थाओं में सफलता पाने का गुर है सभागृह को अपने वश में करने की योग्यता। आपको महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करने के लिए पूरी तैयारी के साथ सभागृह में आना होगा और सभागृह में भाषण देने की कला सीखने के लिए मेहनत करनी होगी। अपने अनुभव के सहारे कहूं तो यह कला सीखना कोई कठिन काम नहीं है। मैं खुद कोई बहुत बड़ा वक्ता नहीं हूं। और मान लीजिए अगर किसी ने भारत की राजनीति में हिस्सा लेने वालों में से अच्छे वक्ताओं की फेहरिस्त बनाने की सोची तब भी वह