86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
निर्धारित की जाएं और यह सिफारिश की कि मताधिकार आयोग को इस प्रश्न पर विशेष ध्यान देना चाहिए और उपलब्ध संस्था, सांविधिक आयोग की सिफारिशों तथा उप-समिति में प्रस्तुत इस सुझाव को देखते हुए सांविधिक आयोग के प्रस्तावों में उल्लिखित आयु-सीमा को 25 से घटाकर 21 कर दिया जाए।
(श्री जोशी, श्री शिवा राव, डॉ. अम्बेडकर और श्री श्रीनिवासन पैराग्राफ 7, 8 और 9 में दिए गए प्रस्तावों से असहमत हैं।)
पैरा 13. उप-समिति का विचार था कि मताधिकार के स्वयमेव विस्तार का कार्यक्रम निर्धारित करना उचित नहीं है। उसने इस बात को वरीयता दी कि यह प्रश्न प्रत्येक प्रांतीय विधान सभा पर छोड़ दिया जाए कि वह नए संविधान के प्रवर्तन की तारीख के बीत जाने के दस वर्ष बाद स्व-विवेकानुसार मताधिकार का विस्तार कर सकता है।
(श्री जोशी, श्री शिवा राव, डॉ. अम्बेडकर तथा श्री श्रीनिवासन ने विचार व्यक्त किया कि मताधिकार के स्वयमेव विस्तार की वरीयता निर्धारित की जाए।)
(चर्चा में डॉ. अम्बेडकर ने कोई टिप्पणी नहीं की। श्री एन.एम. जोशी द्वारा उप-समिति संख्या 6. (मताधिकार) की रिपोर्ट पर समिति के पूर्ण अधिवेशन, 16 जनवरी 1931 में की गई टिप्पणियां।)
श्री जोशीः पैराग्राफ 9 पर मैं एक मुद्दे को स्पष्ट करना चाहता हूं। यह कहा गया है कि श्री जोशी, श्री शिवा राव, डॉ. अम्बेडकर और श्री श्रीनिवासन ने पैराग्राफ 7, 8 और 9 में दिए गए प्रस्तावों से असहमति व्यक्त की है। मैं चाहता हूं कि हय बात नोट की जानी चाहिए कि हम महिलाओं की इस मांग के विरोधी नहीं हैं कि उनके लिए कुछ अर्हताएं निर्धारित की जाएं। दुर्भाग्यवश हमें विवश होकर यह दृष्टिकोण अपनाना पड़ा, जो हमने समिति में अपनाया। उसका कारण यह था कि समिति ने कुल मतदाताओं की एक विशेष सीमा निर्धारित कर दी थी और ऐसी परिस्थितियों में हमारा यह कर्तव्य हो गया कि हम उन लोगों के हितों की रक्षा करें, जिन्हें मताधिकार से वंचित किया गया है, क्योंकि यदि हम उन लोगों की पत्नियों को मत का अधिकार देने के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं, जिन्हें मताधिकार दिया गया है तो उन लोगों को मताधिकार देने की सीमा जिन्हें मताधिकार नहीं दिया गया है, निश्चय ही अधिक होगी। इस विशेष तथा कठिन स्थिति को देखते हएु जिसमें हमें डाल दिया गया था, हमें उन लोगों की पत्नियों को मत प्रदान करने का दृष्टिकोण अपनाना पड़ा, जिन्हें पहले ही मताधिकार दिया जा चुका है और इस प्रकार उन्हें अधिकार से वंचित करना पड़ा, जिन्हें मताधिकार मिला ही नहीं है। हम लिंग के आधार पर अयोग्यता ठहराने के विरोधी नहीं हैं।
अध्यक्षः पैराग्राफ 9 को नोट कर लिया गया।