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पूर्ण अधिवेशन

पांचवी बैठक - 20 नवंबर, 1930

दलित वर्गों के लिए राजनीतिक सत्ता में साझेदारी की आवश्यकता

डॉ. भीमराव अम्बेडकरऽः सभापति महोदय, मैं इस सभा में संवैधानिक सुधारों के प्रश्न पर उन दलित वर्गों का पक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं, जिनका मुझे और मेरे सहयोगी राव बहादुर श्रीनिवासन को प्रतिनिधित्व करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यह ब्रिटिश भारत की 430 लाख जनता अथवा 1/5 जनसंख्या का पक्ष है। दलित वर्ग स्वयं में ऐसे लोगों का समूह है, जो मुसलमानों से भिन्न एवं अलग है। यद्यपि उन्हें हिंदू कहा जाता है, किंतु वे हिंदू जाति का किसी भी अर्थ में अविभाज्य अंग नहीं हैं। वे न केवल उनसे अलग रहते हैं, अपितु उन्हें जो दर्जा प्राप्त है, वह भी भारत में अन्य जातियों के दर्जे से बिल्कुल भिन्न है। भारत में अनेक जातियां अत्यंत दयनीय एवं गुलामी की स्थिति में रह रही हैं, किंतु दलित वर्गों की स्थिति बिल्कुल भिन्न है। अंतर केवल इतना है कृषि कर्मियों और नौकरों के साथ अस्पृश्यता का बर्ताव नहीं किया जाता, जबकि दलित वर्ग अस्पृश्यता के अभिशाप का शिकार है। उससे भी खराब बात यह है कि अस्पृश्यता के कारा उन पर लादी गई गुलामी से न केवल सार्वजनिक जीवन में उनके साथ भेदभाव बरता जाता है, बल्कि उन्हें समान अवसरों और मानवीय जीवन के लिए आवश्यक नागरिक अधिकारों से भी वंचित रखा जाता है। मुझे विश्वास है कि इतने बड़े वर्ग, जिसकी जनसंख्या इंग्लैंड अथवा फ्रांस की जनसंख्या के बराबर है और जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने के लिए भी सक्षम नहीं हैं, के दृष्टिकोण को हृदयंगम करने से ही राजनीतिक समस्या का सही समाधान संभव होगा। मैं चाहता हूं कि उस दृष्टिकोण से यह अधिवेशन प्रारंभ से ही अवगत हो जाए।

मैं दलित वर्गों के पक्ष को यथासंभव संक्षेप में रखने का प्रयास करूंगा। भारत में

ऽप्रोसीडिंग्स ऑफ दि राउंड टेबिल कांफ्रेंस, (फर्स्ट सैशन), गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, पब्लिकेशन ब्रांच,

कलकत्ता, 1931, पृ. 123-29