1. पूर्ण अधिवेशन - Page 21

4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नौकरशाह शासन प्रणाली को बदलकर एक ऐसी सरकार स्थापित की जाए, जो जनता की हो, जनता द्वारा चलाई जाए और जनता के लिए हो। मुझे विश्वास है कि दलित वर्गों के इस पक्ष पर कुछ हलकों में लोगों को विस्मय होगा। दलित वर्ग और ब्रिटिश एक असाधारण बंधन में बंधे हुए हैं। दलित वर्गों ने अंग्रेजों का रूढि़वादी हिंदुओं के सदियों पुराने जुल्मों और अत्याचारों से मुक्ति दिलाने वालों के रूप में स्वागत किया था। उन्होंने हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों के विरुद्ध युद्धों में लड़कर अंग्रेजों को भारत का यह विशाल साम्राज्य जीतकर दिया था, जिसके लिए उन्होंने दलित वर्गों के संरक्षक की भूमिका ग्रहण की थी। दोनों में इस प्रकार के घनिष्ठ संबंधों को दृष्टिगत रखते हुए भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के प्रति दलित वर्गों के विचारों में इस प्रकार का परिवर्तन निस्संदेह एक अत्यंत अद्भुत एवं महत्त्वपूर्ण घटना है। इस परिवर्तन के कारणों के जानने के लिए दूर नहीं जाना होगा। हमने यह निर्णय इसलिए नहीं लिया कि हम बहुसंख्यक जाति के साथ अपना भाग्य आजमाना चाहते हैं, जैसा कि आप जानते हैं कि बहुसंख्यकों और दलित वर्गों में कोई मधुर संबंध नहीं हैं, हमने यह निर्णय स्वतंत्र रूप से लिया है। अपनी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर हमने वर्तमान सरकार का मूल्यांकन किया है और देखा है कि इसमें एक अच्छी सरकार के आवश्यक आधारभूत तत्वों का भी अभाव है। जब हम अंग्रेजी शासन से पहले की अपनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से अपनी वर्तमान स्थिति की तुलना करते हैं, तो हम देखते हैं कि आगे बढ़ने के बजाए हम वहीं के वहीं खड़े हैं। अंग्रेजी शासन से पहले अस्पृश्यता के अभिशाप के कारण हम घृणास्पद जीवन व्यतीत कर रहे थे। क्या अंग्रेजी शासन ने अस्पृश्यता को दूर करने के लिए कोई कदम उठाया है? अंग्रेजी शासन से पहले मंदिरों में हमारा प्रवेश वर्जित था। क्या अब हम मंदिरों में प्रवेश कर सकते हैं? अंग्रेजी शासन से पहले हमें पुलिस में नौकरी नहीं दी जाती थी। क्या अब हम पुलिस में जा सकते हैं? अंग्रेजी शासन से पहले हम सेना में भर्ती नहीं हो सकते थे। क्या सरकार ने हमारे लिए यह रास्ता खोला? इन प्रश्नों में से किसी प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में नहीं है। हम पर अंग्रेजी शासन का लंबे अरसे तक काफी प्रभाव रहा है। उन्होंने हमारा जो भी भला किया, हम उसे स्वीकार करते हैं। किंतु हमारी स्थिति में निश्चय ही कोई मूलभूत अंतर नहीं आया है। वस्तुतः जहां तक हमारा संबंध है, ब्रिटिश सरकार ने सामाजिक व्यवस्थाओं को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया और विश्वासपूर्वक उन्हें उस चीनी दर्जी की भांति सुरक्षित रखा, जिसे पुराने कोट के नमूने पर जब नया कोट सिलने दिया गया, तो उसमें गर्व से पैबंद, खौंच आदि सभी लगा दिए गए। अंग्रेजी शासन के 150 वर्ष बीत जाने पर भी हमारी तकलीफें उन खुले घावों की तरह हैं, जिन पर मरहम लगाने का कोई प्रयास नहीं किया गया।

हमारा आरोप यह नहीं है कि अंग्रेजी शासन ने हमारी उपेक्षा की है अथवा उनकी हमारे प्रति सहानुभूति नहीं है। हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि वह हमारी समस्याओं का समाधान कर ही नहीं सकते। यदि उन्होंने हमारी उपेक्षा की होती, तो बात इतनी गंभीर