192 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
- फौजदारी के मुकदमें की प्रक्रिया के बारे में मौजूदा अधिकारों को यथावत् रखना और उसमें संशोधन, परिवर्तन या परिशोधन करने के किसी उपाय या विधेयक का गवर्नर जनरल की पूर्व स्वीकृति के बिना न लाया जाना।
सहमति-
माननीय आगा खां (मुस्लिम)
डॉ. अम्बेडकर (दलित वर्ग)
राव बहादुर पन्नीर सेलवम (भारतीय ईसाई)
माननीय हेनरी गिडने (आंग्ल भारतीय)
माननीय ह्यूबर्ट कार (यूरोपियन)
परिशिष्ट I का व्याख्यात्मक ज्ञापन
विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व के प्रस्तावित ब्यौरे पर हिन्दुओं या सिखों की सहमति नहीं है, लेकिन केंद्रीय विधान-मंडल में पूर्ण प्रतिनिधित्व के बारे में सिखों की पूर्ण प्रतिनिधित्व की मांग का प्रावधान किया गया है।
विभिन्न समुदायों के लिए स्थानों का प्रस्तावित वितरण संपूर्ण योजना का प्रतीक है और विस्तृत प्रस्तावों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।
स्थानों का वितरण इस सिद्धांत के आधार पर है कि बहुसंख्यक समुदाय को घटाकर किसी भी परिस्थिति में अल्पसंख्यक या किसी के समान नहीं बनाया जाएगा।
वाणिज्य, जमींदारों, उद्योग, श्रम आदि के लिए कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। यह अनुमान कर लिया गया कि ये स्थान अंततः समुदाय आश्रित हैं और जो समुदाय इन हितों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व चाहते हैं, वे अपने कोटे में से इसके लिए व्यवस्था कर सकते हैं।
केंद्रीय विधान-मंडल में 33 ख्1, / 2 प्रतिशत प्रतिनिधित्व की व्यवस्था इस अनुमान पर आश्रित है कि 26 प्रतिशत ब्रिटिश भारत से और कम से कम 7 प्रतिशत समझौता कर भारतीय राज्यों के लिए निर्धारित कोटे में से होगा।
पंजाब में मुस्लिमों, सवर्ण हिन्दुओं और दलित वर्गों से यह अनुरोध करने से कि वह अपने-अपने कुछ स्थान छोड़ दें, सिखों को 54 प्रतिशत का अनुपात मिल जाएगा और इससे उन्हें विधान-मंडल में 20 प्रतिशत स्थान दिया जाए।
ये प्रस्ताव 115 मिलियन लोगों अर्थात् भारत की 46 प्रतिशत जनता के द्वारा स्वीकार-योग्य समझे जाएं।
परिशिष्ट II*
विशेष प्रतिनिधित्व के लिए दलित वर्गों की मांगों के संबंध में डॉ. भीमराव
ऽ पिछले ज्ञापन के लिए कांफ्रेंस के पहले सत्र की अल्पसंख्यक समिति के कार्यवृत्त का परिशिष्ट देखें। दिनांक 4 नवंबर 1931 का यह पूरक ज्ञापन मूल कार्यवृत्त में पृ. 1409-11 पर परिशिष्ट VII के रूप में मुद्रित है।