88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
व्यभिचार को टालने के लिए, प्रत्येक पुरुष की अपनी पत्नी होनी चाहिए और प्रत्येक स्त्री का अपना पति होना चाहिए।.....जलने की बजाय विवाह करना उत्तम है ऐसी पुस्तक जिसमें ऐसे शब्दों का समावेश है, बच्चों तथा स्त्रियों के हाथों में कैसे दे सकते हैं और जब मनुष्य की उत्पत्ति को ही ईसाई बना दिया है, अर्थात् निष्कलंक धर्म-धारण की भावना से कलुषित किया है, तब क्या ईसाई बनना उचित होगा?.......
जिस प्रकार मनु के विधान की पुस्तक में स्त्रियों के प्रति जितनी सुंदर तथा
उत्तम बातें कही गई हैं, ऐसी बातें कहने वाली कोई दूसरी पुस्तक मैं नहीं
जानता। इन वृद्ध सफेद दाढ़ी वालों और संतों ने स्त्रियों का वर्णन करने में
जिस दुस्साहस का परिचय दिया है, उसकी बराबरी कहीं भी नहीं। एक
स्थान पर मनु कहता है - स्त्री का मुख, कुमारी का वक्ष, बच्चे की प्रार्थना
और यज्ञ का धुआं हमेश शुद्ध होते हैं। एक और स्थान पर वह कहता है -
सूर्य का प्रकाश, गाय की छाया, हवा, जल, अग्नि तथा कुमारी की श्वास,
इनसे शुद्ध कोई दूसरी वस्तु नहीं है। और अंत में शायद यह बताना भी एक
पवित्र झूठ है कि स्त्री के शरीर के नाभि के ऊपर का खुला हिस्सा शुद्ध
है और नाभि के नीचे का हिस्सा अशुद्ध है। केवल कुमारी का ही संपूर्ण
शरीर शुद्ध होता है।
इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता है कि जरथूस्त मनु का ही एक नया नाम है और दस स्पेक जरथूस्त मनुस्मृति की ही एक नई आवृत्ति है।
अगर मनु और नीत्शे में कोई अंतर है, तो वह इस बात में है कि नीत्शे यथार्थतः एक नई मानवजाति की रचना करना चाहता था जो कि वर्तमान मानव जाति की तुलना में महामानवों की जाति हो। इसके विपरीत मनु एक ऐसी जाति के विशेषाधिकारों की रक्षा में दिलचस्पी रखता था जो अनाधिकार रूप से महामानव बनने की चेष्टा करते थे। नीत्शे के महामानव उनके गुणों से महामानव थे, मनु के महामानव केवल उनके जन्म के कारण महामानव बनते थे। नीत्शे एक सच्चा निस्वार्थी दार्शनिक था। इसके विपरीत मनु एक ऐसा भाड़े का दलाल था, जो एक विशेष समुदाय में जन्मे लोगों के स्वार्थ की रक्षा करने के लिए रखा गया था - जो अपने गुणों को खो भी दें तो भी उनका महामानव का स्तर नहीं खोया जा सकेगा। वह ऐसे दर्शन का प्रणेता था। हम मनु के निम्नलिखित उदाहरणों की तुलना करते हैंः
10.81. ब्राह्मण यदि अपने कर्म से जीवन निर्वाह कर सके, तो क्षत्रिय का कर्म
करता हुआ जीवन निर्वाह करे क्योंकि क्षत्रिय वर्ग उसका समीपवर्ती है।
10.82 यदि वह दोनों (ब्राह्मण कर्म तथा क्षत्रिय कर्म) से जीवन निर्वाह
नहीं कर सकता तो ब्राह्मण किस प्रकार रहे? यदि ऐसा संदेह हो जाए, तो