90 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यही प्रश्न मनु से पूछे जा सकते हैं और इनमें से प्रत्येक प्रश्न का उत्तर सकारात्मक होना चाहिए।
संक्षेप में, हिंदू धर्म का दर्शन ऐसा है कि उसे मानवता का धर्म नहीं कहा जा सकता। इसीलिए ही बाल्फोर की भाषा का उपयोग करते हुए हम कह सकते हैं कि यदि हिंदू धर्म सर्वसाधारण लोगों के जीवन में गहरे प्रवेश करता है, लेकिन उन्हें सुरक्षा का कवच नहीं प्रदान करता। वस्तुतः उन लोगों को विकलांग बनाता तो हिंदु धर्म में सामान्य मानवीय आत्माओं के लिए कोई पोषक तत्व नहीं है। साधारण मानवीय दुख का कोई समाधान नहीं है। साधारण मानवीय कमजोरी के लिए कोई सहायता नहीं है, कुल मिलाकर हिंदू धर्म लोगों को अंधकार में छोड़ देता है। इतने क्रूर अधर्म से अधिक क्रूर कार्य और क्या हो सकता है। वह मनुष्य का ईश्वर के साथ जो संबंध है, उसे ही भंग कर देता है।
हिंदू धर्म का दर्शन ऐसा है। वह महामानव (ब्राह्मण) के लिए स्वर्ग है, तो साधारण मनुष्य के लिए नर्क है।
मैं जानता हूं कि हिंदू धर्म के दर्शन के संबंध में मेरे विचारों पर चारों ओर से आक्रमण हो सकता है। इसके संबंध मेंं जो वर्तमान धारणाएं हैं, उनसे यह स्थिति इतनी विपरीत है कि उस पर आक्रमण होना अनिवार्य है। यह आक्रमण भिन्न दिशाओं से हो सकता है।
ऐसा कहा जाएगा कि मनुस्मृति, हिंदू धर्म का धर्म ग्रंथ है। मेरा ऐसा मानना ही गलत है और हिंदुत्व का शिक्षा सार वेद तथा भगवतगीता में सम्मिलित है।
परंतु यह मेरा निश्चित विश्वास है कि कोई भी रूढि़वादी हिंदू ऐसा कहने का साहस नहीं कर सकता है कि मनुस्मृति, हिंदू धर्म का धर्म-ग्रंथ नहीं है। ऐसा आरोप केवल कुछ सुधारवादी हिंदू पंथ के लोग, जैसे कि आर्य-समाज के लोग ही लगा सकते हैं। परंतु इस आरोप के उत्तर के लिए शायद यह उचित होगा कि विभिन्न स्मृतियों ने हिंदूओं में कैसे अधिकार का स्थान प्राप्त किया। ख्1, इस बात को स्पष्ट किया जाए।
मूलतः रूप से, स्मृति उन नियमों का संग्रह है, जिनका संबंध सामाजिक परंपरा, रूढि़यों तथा मान्यताओं से है और जिन्हें उन लोगों द्वारा मान्यता मिली हुई है, उन्होंने उसे पुरस्कृत किया है, जिन्हें वेदों का ज्ञान है। दीर्घ समय तक ये नियम, इन वेदों के ज्ञान ज्ञान-प्राप्त लोगों की स्मृति में ही बसे हुए थे, इसीलिए उन्हें स्मृति कहा जाने लगा, अर्थात् कुछ ऐसी बातें, जो वेदों या श्रृति से अलग याद रखी जाती हैं, जिसका
- देखिए, प्रो. अल्तेकर द्वारा लिखित ‘दि पोजीशन आफ स्मृतिज एज ए सोर्स आफ धर्म’ (काने मैमोरियल
वोल्यूम) पृ. 18-25