1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 106

हिंदुत्व का दर्शन

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अर्थ है, ऐसी बातें जिन्हें सुना गया है। यहां यह भी बता देना आवश्यक है कि शुरू में जब स्मृति की नियमावली बनाई जा रही थी, तब भी उसके नियमों को वेदों में सम्मिलित नियमों की तुलना में निम्न स्तर का ही माना जाता था।

उनके अधिकार तथा बंधनों में जो अंतर है, वह उस स्वभाविक अंतर का नतीजा है, जो किसी बात को सुनने की तुलना में किसी बात को याद रखने का विश्वास करने की योग्यता में होता है। इन दो प्रकार के धर्मशास्त्रों में यह जो अंतर है, उसका और भी एक कारण है। यह अंतर इनके लेखकों के स्तर पर आधारित है। वेदों के लेखक ऋषि थे। स्मृति के लेखक केवल विद्वान व्यक्ति थे, और ऋषियों का स्तर तथा मान्यता उन लोगों से निश्चित श्रेष्ठ थी जो केवल विद्वान थे। परिणामस्वरूप, वेदों को स्मृति की तुलना में अधिक अधिकारयुक्त माना गया।

इसके कारण जो परिस्थिति निर्मित होती है, उसे हिंदू ब्रह्मविज्ञान में उत्तम प्रकार से स्पष्ट किया गया। इसके अनुसार, यदि किसी समान विषय पर दो वेदों के नियमों में विरोध उत्पन्न हो जाए, तब किसी भी एक नियम का पालन करने की अनुमति दी जाती है, परंतु दोनों ही नियम कार्यरत रहते हैं। इसके विपरीत, जब श्रुति तथा स्मृति के नियमों में विरोध उत्पन्न हो जाए, जब श्रुति का नियम ही माना जाए क्योंकि, ऊपर बताया गया है, स्मृति का स्तर श्रुति के अधिकार की तुलना में हीन है। लेकिन जैसा कि प्रो. अल्तेकर ने स्पष्ट किया है। कुछ समय बीतने के बाद स्मृति को भी वही अधिकार प्राप्त हो जाएं, जो वेदों को मिले थे और उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विभिन्न उपाय अपनाए गए। प्रथम स्थान पर स्मृति के लेखक का स्थान ऋषियों के स्तर तक ऊंचा उठाया गया, जो आरंभिक धर्मशास्त्रों के लेखक थे, जैसे कि गौतम और बोद्धायन। उन्होंने कभी भी ऋषियों का समान स्तर नहीं दिया गया। परंतु मनु और याज्ञवलक्य को ऋषि की मान्यता दे दी गई और इस माध्यम से स्मृति का स्तर श्रुति के समान स्तर पर लाया गया। स्मृति को श्रुति की यादगार का एक ऐसा लिखित प्रमाण मानना, जो नष्ट हो गया है, यह दूसरा उपाय अपनाया गया। इस प्रकार स्मृति, एक ऐसी वस्तु जो श्रुति से सर्वथा भिन्न है, ऐसी माने जाने के बजाय श्रुति से बिल्कुल मिलती-जुलती और अभेद्य मानी जाने लगी। इन उपायों का नतीजा दोनों के अधिकारों से संबंधित नियमों में संपूर्ण परिवर्तन में हुआ। प्रारंभ में यदि स्मृति और श्रुति में विरोध हो जाए तब श्रुति का अधिकार ही चलता था। नया नियम यह हो गया कि विरोध की ऐसी स्थिति में किसी भी नियम को मानने की अनुमति थी, जिसका अर्थ यह था कि स्मृति का नियम भी उतना ही कार्यरत था, जितना कि श्रुति का इस नए नियम को, कुमारिल ने अपने पूर्व मीमांसा के भाष्य में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है, जिसके द्वारा स्मृति को भी उतना ही अधिकार-युक्त बनाया गया जितना कि श्रृतियां थीं।