108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मद्रास राज्य के तिन्नेवेल्ली जिले में न देखने योग्य लोगों का एक ऐसा वर्ग है, जिन्हें पूरड वंन्नन कहा जाता है उनके बारे में ऐसा कहा जाता है कि उन्हें दिन में विचरण करने की इजाजत नहीं होती क्योंकि उनका दर्शन भी अपवित्र माना जाता है। इन दुर्भाग्यशाली लोगों को रात्रि के समय कार्य करने के लिए मजबूर किया जाता है। वे अंधेरा होने पर अपने घर से निकलते हैं और तब वापस लौटते हैं, जब बिज्जू रीछ के समान किसी भी प्राणी की झूठी आवाज सुनते हैं।
इन सभी वर्गों की कुल जनसंख्या पर हम विचार करें। आदिवासी लोगों की कुल मिलाकर 250 लाख आवादी है। अपराधी जातियां 45 लाख हैं और अस्पृश्यों की संख्या 500 लाख है। इन सबको मिलाकर कुल संख्या 795 लाख बनती है। अब हम यह पूछ सकते हैं कि ये लोग हिंदू धर्म में रहते हुए भी नैतिक, भौतिक, सामाजिक तथा धार्मिक अधःपतन की अवस्था में कैसे रह रहे हैं। हिंदू जन कहते है कि उनकी संस्कृति अन्य किसी भी संस्कृति से पुरानी है यदि ऐसा है, तब हिंदू धर्म इन लोगों को उन्नत करने में उन्हें ज्ञान देने में तथा उनमें आशा जगाने में असफल क्यों रहा? यह कैसे हो सकता है कि हिंदू धर्म उन्हें सुधारने में भी असफल हो गया? यह कैसे हो सकता है कि जब लाखों लोग शर्मनाक तथा अपराधी जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हो रहे थे तब हिंदू धर्म हाथ बांधकर खड़ा रहा? इन सब प्रश्नों का क्या उत्तर है? इन सबका केवल एक ही उत्तर है कि हिंदू धर्म अपवित्रता के भय से व्याकुल है। उसमें शुद्धता लाने की शक्ति नहीं है। उसमें सेवाभाव की चेतना ही नहीं है और ऐसा इसलिए है क्योंकि उसकी मूल प्रकृति अमानवीय तथा अनैतिक है उसे धर्म कहना ही गलत बात है। इसका दर्शन, जिसके लिए धर्म का अस्तित्व है, उसका ही विरोधी है।