हिंदुत्व का दर्शन 107
परिवेश था जिसके अंतर्गत वे लोग अपने द्वारा की गई हत्या छुपा सकते थे और इसके कारण ही सदियों तक वे अपनी कला का प्रदर्शन करते रहे। इस संबंध में यह एक बहुत ही विशेष बात है कि भारत के उस समय के हिंदू एवं मुसलमान शासकों ने ठगी को एक नियमित व्यवसाय के रूप में मान्यता दी थी। ठग लोग राज्य को कर देते थे और उन्हें राज्य बिना दंड के छोड़ देता था।
अंग्रेजों ने इस देश का शासक बनने के बाद ही ठगों के दमन का प्रयास किया। सन् 1835 तक 382 ठगों को फांसी दी गई और 986 लोगों को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भगाया गया अथवा आजीवन कैद की सजा दी गई। यहां तक कि काफी अंतराल के बाद भी सन् 1879 में पंजीकृत ठगों की संख्या 344 थी और भारत सरकार का ठगी एवं डकैती विभाग सन् 1904 तक अस्तित्व मेंं था। इसके बाद उसका स्थान केंद्रीय अपराध अन्वेषण विभाग ने ले लिया। आज जब कि इन अपराधी जातियों के लिए अपराधियों के संगठित संगठन के माध्यम से जीवन व्यतीत करना संभव नहीं है, फिर भी अपराध करना उनका मुख्य व्यवसाय बना हुआ है।
इन दो वर्गों के अलावा एक तीसरा वर्ग भी है, जो ऐसे लोगों का बना हुआ है, जिन्हें, अस्पृश्य नाम से जाना जाता है।
इन अस्पृश्यों के नीचे कुछ अन्य लोग भी हैं, जिन्हें अप्रवेश्य माना जाता है। अस्पृश्य वे लोग होते हैं जिनके स्पर्श करने पर मनुष्य अपवित्र बन जाता है। अप्रवेश्य या पहुंच के बाहर के लोग वे लोग हैं जिनके कुछ अंतर के नजदीक आने पर मनुष्य अपवित्र हो जाता है। नायडी लोगों के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वे लोग हैं जो न पहुंचने योग्य की श्रेणी में आते हैं और हिंदुजनों में से सबसे नीची जाति के हैं, जो कुत्ते का मांस खाते हैं। ये वे लोग हैं जो भीख मांगने के कार्य में भारी आग्रह करते हैं, और कोई भी पैदल चलने वाले, वाहन चलाने वाले अथवा नाव चलाने वाले व्यक्ति का एक आदरयुक्त अंतर रखते हुए वे मीलों तक उसका पीछा करते हैं। यदि उन्हें कुछ दिया जाए तब उसे नीचे जमीन पर रखना चाहिए और भीख देने वाले व्यक्ति से एक पर्याप्त दूरी तक चले जाने के बाद से भिखारी लोग बहुत ही घबराते हुए आगे आते हैं और उसे उठाते है। उन्हीं लोगों के बारे में श्री थर्स्टन कहते है - ‘इन आश्रित (नायडी) लोगों का, जिनकी मैंने परीक्षा की, और शोरानूस में उनकी गिनती की, यद्यपि वे केवल तीन मील की दूरी पर रहते थे, अपनी परंपरागत अपवित्रता के कारण नदी पर बनाए गए लंबे पुल पर चल नहीं सकते थे, और इसके लिए उन्हें घूमकर अनेक मीलों का रास्ता तय करके आना पड़ता था’।
इनमें न पहुंचने योग्य लोगों के नीचे न देखने योग्य लोग हैं।