2. हिंदू समाज व्यवस्था : इसके मूलभूत सिद्धांत - Page 126

अध्याय 2
हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसके मूलभूत सिद्धांत

I

हिंदू समाज-व्यवस्था की क्या विशिष्टता है? क्या यह एक स्वतंत्र समाज है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यह समझना आवश्यक है कि स्वतंत्र समाज-व्यवस्था कैसी होती है। सौभाग्य से इस मामले पर बहुत अधिक विवाद नहीं है। फ्रांस की क्रांति से लेकर आज जब स्वतंत्र सामाजिक व्यवस्था के आवश्यक लक्षणों के बारे में कोई मतभेद नहीं है। ये आवश्यक तत्व कई हो सकते हैं, लेकिन इसमें दो तत्व तो अनिवार्य है। पहली अनिवार्यता यह है कि समष्टि में व्यष्टि का समावेश होता है और समाज का लक्ष्य उस व्यष्टि को बढ़ाना तथा उसके व्यक्तित्व का विकास करना बन जाता है। समाज व्यक्ति से ऊपर नहीं होता और यदि व्यक्ति स्वयं को समाज के अधीन मानता है, तो उसका कारण यह है कि उसे समाज की अधीनता में अपनी बेहतरी का आभास होता है। यह अधीनता केवल उस समय तक रहती है, जब तक उसकी आवश्यकता महसूस की जाए।

दूसरी अनिवार्यता यह है कि किस समाज के सदस्यों के बीच सामाजिक धरातल पर स्वतंत्रता, समानता तथा भाईचारे को महत्व दिया जाना चाहिए।

किसी समाज की स्वतंत्र व्यवस्था के लिए ये दो तत्व अनिवार्य क्यों हैं? समस्त सामाजिक उद्देश्यों के संदर्भ में व्यष्टि को साध्य क्यों माना जाना चाहिए, यह साधन क्यों नहीं हो सकता? इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिए इस बात को समझना आवश्यक है कि जब हम मानव के विषय में बात करते हैं तो इसका तात्पर्य क्या है? हमें मानव अधिकारों की रक्षा के लिए अपने अमूल्य संसाधनों तथा अनेक जिंदगियों का बलिदान क्यों करना चाहिए? इस प्रश्न का सबसे बेहतर जवाब प्रोफेसर जैक्स मैरिटेन देते हैं। प्रोफेसर मैरिटेन ‘दि कांक्वेस्ट ऑफ फ्रीडम ख्1, ’ नामक अपने निबंध में लिखते हैंः

‘‘जब हम मानव के विषय में बात करते हैं, तो हमारा तात्पर्य मात्र यही

नहीं होता है कि कोई व्यक्ति एक व्यष्टि अर्थात् समाज की इकाई है।

ठीक वैसे ही, जैसे एक अणु, घास का तिनका, एक मक्खी या एक हाथी

  1. फ्रीडम-इट्स मीनिंग, रूथ नंदा किशन, पृ. 214