2. हिंदू समाज व्यवस्था : इसके मूलभूत सिद्धांत - Page 127

112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अलग-अलग इकाईयां हैं, व्यक्ति भी एक इकाई होता है जो अभी बृद्धि

और इच्छा-शक्ति से स्वयं के अस्तित्व को बनाए रखता हैं। केवल उसका

शारीरिक अस्तित्व ही नहीं होता, बल्कि उसके पास ज्ञान और प्रेम जैसे

उच्च आध्यात्मिक भाव भी होते हैं जिससे वह कुछ मायनों में स्वयं में एक

ब्रह्मांड है। वह एक ऐसा प्राणी है, जिसमें ज्ञान के माध्यम से उसकी संपूर्णता

के साथ एक विशाल ब्रह्मांड को समेटा जा सकता है। प्रेम-भाव द्वारा वह

अन्य प्राणियों से अपने को जोड़ सकता है। ऐसे संबंधों का साक्ष्य भौतिक

संसार में अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकता। यह विशिष्टताएं मानव में होती

हैं, क्योंकि मानव हाड़-मांस का पुतला होते हुए भी एक दैवी अग्नि से

संपन्न है जो उसे क्रियाशील रखती है, जो उसमें जीवंत रहती है और यह

अग्नि उसमें गर्भधारण से लेकर अर्थी चढ़ने तक मौजूद रहती है। आत्मा

अजर और अमर है अर्थात् समय और मृत्यु से परे है। आत्मा व्यक्तित्व

का मूल है। इस प्रकार व्यक्तित्व के अंतर्बोध में संपूर्णता तथा स्वतंत्रता का

महत्वपूर्ण स्थान है। भले ही कोई व्यक्ति कितना ही दीन-हीन क्यों न हो, तो

वह समाज की एक इकाई ही। और एक व्यक्ति के रूप में उसका स्वतंत्र

व्यक्तित्व है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यदि व्यक्ति एक प्राणी

है और एक संपूर्ण तत्व की समग्रता से अधिक उसकी स्वतंत्र सत्ता अधिक

महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि वह संपूर्ण तत्व का एक सूक्ष्म कण है,

जो एक ब्रह्मांड है। संपूर्ण मानव जाति में भिखारी भी एक इकाई है। वह

हाड़-मांस का पुतला होता है, जिसका कि साक्षात एक मूल्य तथा महत्व

होता है किन्तु वह असहाय होता है। वैसे वह स्वर्ग का प्रहरी है। यह एक

आध्यात्मिक रहस्य है, जिसका धार्मिक सिद्धांतों में स्वस्थ उल्लेख है, और

इसीलिए कहा जाता है कि मानव ईश्वर की प्रतिमूर्ति है। मनुष्य का मूल्य,

उसकी गरिमा तथा अधिकार उन नैसर्गिक पवित्र वस्तुओं से संबंध रखते

हैं, जिससे परमपिता परमेश्वर की छाप होती है और जो उसके भीतर उनके

लक्ष्यों को निर्धारित करती है।’’

समानता क्यों परवमावश्यक है? इस विषय का सबसे अच्छा वर्णन प्रो. बियर्ड ने अपने निबंध ‘फ्रीडम इन पालिटिकल थाट’ में किया है और उनको उद्धत करने के अलावा मैं और कुछ नहीं करूंगा। प्रो. बियर्ड ख्1, के अनुसारः

‘‘समानता एक निरर्थक शब्द है, किन्तु इसका कोई विकल्प भी नहीं है।

समानता का अर्थ है, ‘ठीक वैसा ही अर्थात् माप, तोल, गुण, धर्म और कर्म

में समान’। यह एक ऐसा शब्द है जो भौतिक-शास्त्र तथा गणित में तो चल

सकता है, लेकिन मानव के साथ उपयोग में लाने पर सटीक अर्थ नहीं देता।

  1. फ्रीडम-इट्स मीनिंग, पृ. 11-13