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हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसके मूलभूत सिद्धांत

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8.384 यदि कोई वैश्य किसी रक्षित क्षत्रिय स्त्री के साथ व्यभिचार करता

है तो जुर्माना पांच सौ पण होगा, लेकिन यदि कोई क्षत्रिय किसी वैश्य स्त्री

के साथ व्यभिचार करता है तो उसका सिर मूत्र में मुंडवा देना चाहिए या

उससे उल्लिखित जुर्माना लेना चाहिए।

हिंदू तथा गैर हिंदू अपराध न्याय-शास्त्र में कितना विचित्र अंतर है। हिंदूत्व में कितनी असमानता है, यह उसके अपराध न्याय-शास्त्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। न्याय की भावना से युक्त दंड संहिता में हमें दो चीजें देखने को मिलती हैंµ एक वह वर्ग जो अपराध को परिभाषित करने का कार्य करता है तथा दूसरा वह वर्ग जो अपराध करने के लिए दंड के न्यायोचित स्वरूप का निर्धारण और नियमों का निर्धारण करता है कि अपराध करने वाले सभी लोग समान दंड के अधिकारी हैं। लेकिन मनु में हम क्या पाते है? पहले तो दंड की प्रणाली न्यायोचित नहीं है। किसी अपराध का दंड संबंधित उद्गम अंग को दिया जाता है, जैसे पेट, जीभ, नाक, आंख, कान, जनद्रिय आदि, मानों कि अपराध करने वाले अंग की कोई अलग इच्छा हो और जो मानव की अतिजीवी सत्ता नहीं हैं। मनु की दंड संहिता की दूसरी विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत दंड की प्रकृति अमानवीय है, जो अपराध की गंभीरता से मेल नहीं खाती है। लेकिन उसकी सबसे अधिक विस्मयकारी विशेषता उस समय अपने विकराल रूप में दिखाई देती है, जब एक ही अपराध के लिए असमान दंड दिया जाता है। यह असमानता न केवल अपराधकर्ता को दंडित करने के लिए बनाई गई है, बल्कि मर्यादा की रक्षा करने और न्याय पाने के लिए न्यायालय में आने वाले पक्षों की अधीनता को बनाए रखने के लिए बनाई गई है, दूसरे शब्दों में, यह सामाजिक असमानता को बनाए रखने के लिए बनाई गई है। जिस पर उनकी पूरी योजना आधारित है।

क्रमिक असमानता का यह सिद्धांत आर्थिक क्षेत्र में भी घुसा बैठा है। हिंदू समाज-व्यवस्था का सिद्धांत यह नहीं है कि ‘किसी की हैसियत के अनुसार लो और आवश्यकतानुसार दो’। हिंदू समाज-व्यवस्था का सिद्धांत है, आवश्यकतानुसार लो और श्रेष्ठता के अनुसार दो। मानो कि कोई अधिकारी अकाल से पीडि़त लोगों को अनुदान बांट रहा हो, तो वह निम्न वर्ग के कामों की तुलना में उच्च वर्ग के लोगों को अधिक अनुदान देने के लिए बाधय होगा। ख्1, इसी तरह मानो कोई अधिकारी कर लगा रहा हो तो वह उच्च वर्ग के व्यक्ति पर कम कर लगाएगा और निम्न वर्ग के व्यक्ति पर अधिक कर लगाएगा। हिंदू समाज-व्यवस्था समान आवश्यकता, समान

  1. उक्त उदाहरण मात्र कल्पना पर आधारित नहीं है, इतिहास पर आधारित तथ्य है। ऊंच तथा नीच के

अंतर के पेशवा के समय में कानून द्वारा मान्यता प्रदान की गई। अनुदान के बाद में जो अंतर है, वह

आज भी बंबई प्रेसिडेंसी में देखने को मिलता है और एक कांग्रेसी मंत्री द्वारा इसका पक्ष लिया गया।

यह सब आज प्रयोग में नहीं है - संपादक