130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कार्य, या समान योग्यता पर समान पारिश्रमिकता को मान्यता प्रदान नहीं करती। जीवन में अच्छी चीजों के वितरण के संबंध में इसका एकमात्र लक्ष्य यह है कि जिन लोगों को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, उन्हें सबसे अधिक और सबसे अधिक मिलना चाहिए और जो लोग निम्न वर्ग के अंतर्गत आते हैं उन्हें निम्नतम तथा निकृष्टतम पर ही संतोष कर लेना चाहिए।
यह सिद्ध करने के लिए और कुछ आवश्यक प्रतीत नहीं होता हो कि हिंदू समाज व्यवस्था वर्गीकृत असमानता के सिद्धांत पर आधारित है। यह सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों में व्यापक है। सामाजिक जीवन का प्रत्येक पक्ष समानता के खतरे के प्रति सचेत है।
हिंदू समाज व्यवस्था का दूसरा सिद्धांत जिस पर हिंदू समाज व्यवसायी आधारित है, वह प्रत्येक वर्ग के लिए व्यवसाय का निर्धारण और वंशानुक्रम के आधार पर उसके जारी रहने का सिद्धांत हैं मनु चारों वर्णों के व्यवसायों के बारे में ऐसा कहता है रु
1.87 इस ब्रह्मांड की रक्षा करने हेतु, ईश्वर ने अपने मुंह, अपनी भुजा, अपनी
जंघा तथा अपने पैरों से पैदा हुए लोगों के लिए अलग-अलग व्यवसाय
(कर्म) निर्धारित किए।
1.88 ब्राह्मणों के लिए उसने पढ़ना और पढ़ाना (वेद), अपने तथा दूसरों
के लाभ के लिए यज्ञ कराना और करना, दान देना और लेना, कर्म निर्धारित
किए हैं।
1.89 लोगों की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, अध्ययन (वेद) करना, विषय
में अशक्ति नहीं रखना, कर्मों का आदेश उसने क्षत्रिय के लिए दिया है।
1.90 वैश्यों के लिए पशुओं को पालना, दान देना, यज्ञ करना, धार्मिक ग्रंथों
को पढ़ना, व्यापार करना, ब्याज पर पैसा उधार देना, खेती करना जैसे कार्य
निर्धारित किए गए हैं या उन्हें करने की अनुमति दी गई है।
1.91 ब्रह्मा ने शूद्र के लिए जो एक सबसे प्रमुख कार्य सौंपा है, वह है
बिना किसी उपेक्षाभाव के उक्त तीनों वर्गों की सेवा करना।
10.74 ऐसे ब्राह्मण जो उत्कृष्ट देवत्व प्राप्त करने के इच्छुक हैं और अपने
कर्तव्य के प्रति दृढ़ है, वे छह कार्यों को क्रमानुसार पूर्णरूपेण निष्पादित करें।
10.75 वेदों का अध्ययन करना, दूसरों को वेदों का अध्ययन कराना, दूसरों
को यज्ञ करने में सहायता करना, अपने पास प्रचुर संपत्ति होने पर गरीबों को
दान देना, स्वयं के गरीब होने पर सदाचारी लोगों से दान स्वीकार करना ये
अग्रज वर्ग के छह निधारित कार्य हैं।