2. हिंदू समाज व्यवस्था : इसके मूलभूत सिद्धांत - Page 149

134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

को ही मान्यता प्रदान की है, जिसके अनुसार लोगों के ऊपर कानून का राज्य होगा। लेकिन यह इस प्रतिपाद्य विषय के दूसरे भाग की उपेक्षा करती है, जिसके अनुसार नियम (कानून) लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा ही बनाए जा सकते हैं। हिंदू समाज-व्यवस्था का सिद्धांत यह है कि जिस कानून के द्वारा लोग शासित होते हैं, वह कानून पहले से ही बना हुआ है और वह वेदों में उपलब्ध है। किसी को भी इस कानून में संशोधन का अधिकार नहीं है। ऐसा होने के कारण लोगों द्वारा चुनी गई प्रतिनिधि सभा अनावश्यक हो जाती है। राजनीतिक स्वतंत्रता वह स्वतंत्रता होती है, जिसमें कानून बनाने की स्वतंत्रता होती है और सरकार को बनाने या बदलने का कोई तात्पर्य नहीं है जिसके लिए हिंदू समाज-व्यवस्था में स्थान ही नहीं है।

संक्षेप में, हिंदू समाज-व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है, जो वर्णों पर आधारित है, न कि व्यक्तियों पर। यह वह व्यवस्था है, जिसमेंं वर्णों को एक-दूसरे के ऊपर श्रेणीबद्ध किया गया है। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें वर्णों की प्रतिष्ठा तथा कार्यनिर्धारण निश्चित है। हिंदू समाज-व्यवस्था एक कठोर सामाजिक प्रणाली है। इस बात से उसे कोई लेना-देना नहीं कि किसी व्यक्ति के पद और प्रतिष्ठा में अपेक्षाकृत परिवर्तन हो, लेकिन वह जिस वर्ण में पैदा हुआ है, उस वर्ण के सदस्य के रूप में उसकी सामाजिक स्थिति दूसरे वर्ण के दूसरे व्यक्ति के संदर्भ में किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होगी। उच्च वर्ण में जन्में और निम्न वर्ण में जन्में व्यक्ति की नियति उसका जन्मजात वर्ण ही है।