हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसके मूलभूत सिद्धांत
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4.29-30 जिस गृहस्थ के घर में शक्ति के अनुसार, आसन, भोजन, शैया
जल और कंद मूल से अतिथि का सम्मान नहीं होता, उसमें कोई अतिथि
निवास न करे।
उसे विधर्मी, वे व्यक्ति जो निषिद्ध व्यवसाय करते हैं, वे लोग जो बिल्लियों,
दुष्टों, तर्क-शस्त्रियों (वेदों के खिलाफ बहस करने वाले) और वक की
तरह रहते हैं, ऐसे लोगों द्वारा किए जाने वाले सम्मान को स्वीकार नहीं
करना चाहिए।
2.10 वेद को श्रुति और धर्म-शास्त्र को स्मृति जानना चाहिए, वे सभी विषयों में
तर्क के योग्य नहीं हैं, क्योंकि उन दोनों में ही धर्म का प्रादुर्भाव होता है।
2.11 प्रत्येक द्विज, जो न्यायविदों पर निर्भर करता है, और तर्क-शास्त्र
तथा उपचार इन दोनों श्रोतो (कानून के) को घृणा की दृष्टि से देखता है,
वेद-निदंक वह मनुष्य सज्जनों द्वारा बहिष्कृत करने योग्य है।
2.12 वेद, पवित्र स्मृति, आचार और मन की प्रसन्नता-ये चार धर्म के
साक्षात लक्षण हैं।
इसका कारण उस समय स्पष्ट हो जाता है, जब मनु कहता हैः
2.6 सब वेद, उनको जाननने वालों की स्मृति और ब्राह्मणत्व, महात्माओं का
आचरण और अपने मन की प्रसन्न्ता - ये सब धर्म के मूल हैं।
2.7 मनु ने जिस किसी का जो धर्म कहा है, वह धर्म वेदों में कहा गया
है। मनु सब वेदों के अर्थों के ज्ञाता हैं।
इस स्वतंत्रता में न्यायविदों क लिए कोई स्वतंत्रता नहीं है, तर्कशास्त्रियों के लिए समाज-व्यवस्था की समालोचन की भी स्वतंत्रता नहीं है, जिसका तात्पर्य यह है कि कहीं भी कोई स्वतंत्रता नहीं है।
कार्य करने की स्वतंत्रता की स्थिति कैसी है? कार्य-चयन के मामले में हिंदू समाज-व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है। हिंदू समाज-व्यवस्था व्यक्ति को कोई अधिकार नहीं देती है उसके व्यवसाय को स्वयं निर्धारित करती है यह उसकी हैसियत भी निर्धारित करती है। व्यक्ति विशेष को तो विधान का पालन ही करना होता है।
ठीक यही बात राजनीतिक स्वतंत्रता के बारे में कहीं जा सकती है। हिंदू समाज-व्यवस्था में लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों से बनी प्रतिनिधि सरकार की आवश्यकता को कोई मान्यता नहीं दी जाती। प्रतिनिधि सरकार इस सिद्धांत पर आधारित होती है कि लोगों पर कानून का राज्य हो और कानून लोगों के प्रतिनिधियों द्वारा ही बनाया जा सकता है। समाज-व्यवस्था में इस प्रतिपाद्य विषय के प्रथम भाग