136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जीवन की स्वीकारोक्ति है, स्वयं जीवन के प्रति कल्याण की विजयानभूमि है
- कुल मिलाकर यह पुस्तक अति श्रेष्ठ है। प्रसव, औरत, शादी-विवाह संबंधी
वे सभी बातें, जो इसाई धर्म में अगाध अश्लीलता से भरी पड़ी हैं, इनको यहां
बड़ी सहजता, सम्मान, प्यार तथा विश्वास के साथ वर्णित किया गया है। भला
कोई ऐसी पुस्तक को बच्चों या औरतों के हाथ में कैसे दे सकता है, जिसमें
अश्लील शब्द भरे पड़े हैं, व्यभिचार रोकने के लिए हरेक आदमी की अपनी
पत्नी और हर औरत का अपना पति होना चाहिए (कामाग्नि) जल जाने से
शादी करना ज्यादा बेहतर होता है और जब तक आदमी की उत्पत्ति को ही
ईसाई धर्म में न बदल दिया, तब क्या ईसाई होना अच्छी बात है। अर्थात् कुमारी
केरी के गर्भाधारण द्वारा कलुकषित किया जाता हैं’’।
नीत्शे को कभी भी अपने देश मेंं कोई सम्मानजक या महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त नहीं हुआ और न लोगों ने उसे गंभीतरता से सुना। उसके अपने ही शब्दों में कभी कुलीन वर्ग तथा सामंत वर्ग के दार्शनिक के रूप मेंं उसका विरोध किया गया, कभी उसकी खिल्ली उड़ाई गई, कभी उस पर दया दिखाई गई तथा कभी एसके अमानवीय प्राणी के रूप में बहिष्कृत किया गया। नीत्शे का दर्शन है सत्तालोलुपता हिंसावृत, आध्यात्मिकता का परित्याग, महामानव के हित में सामान्य जल की दासता और अधोगति। उसके दोषपूर्ण दर्शन ने उसके अपने ही समय के लोगों के दिलो-दिमाग में जुगुप्सा तथा भय उत्पन्न किया था। यदि उसे बहिष्कृत नहीं किया गया तो उसे उपेक्षित तो पूरी तरह से किया गया, और नीत्शे ने स्वयं अपने को मरणोत्तर व्यक्तियों की श्रेणी में रख लिया था। उसने सोचा था कि सदियों के बाद जनता उसके कार्यों के लिए उसकी प्रशंसा करेगी। यहां फिर नीत्शे को निराशा ही हाथ लगी। उसके दर्शन की प्रशंसा होने के बजाए समय के साथ लोगों के मन में नीत्शे के लिए भय और घृणा की भावना बढ़ी। नीत्से के दर्शन की दुष्ट प्रकृति को देखते हुए कुछ लोग तो यह विश्वास भी नहीं करेंगे कि हिंदू समाज व्यवस्था महामानव की पूजा पर आधारित है।
देखें इस विषय में मनुस्मृति क्या कहती है। हिंदू समाज व्यवस्था में ब्राह्मण की स्थिति के बारे में मनु का विचार इस प्रकार हैः
1.93 ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने से ज्येष्ठ होने से और वेद के धारण
करने से धर्मानुसार ब्राह्मण ही संपूर्ण सृष्टि का स्वामी होता है।
1.94 स्वयंभू उस ब्रह्मान हव्य तथा कव्य को पहुंचाने क लिए और संपूर्ण
सृष्टि की रक्षा के लिए तपस्या कर सर्वप्रथम ब्राह्मण को ही अपने मुख
से उत्पन्न किया।
1.95 ब्राह्मण के मुख से देवता लोग हव्य तथा पितर लोग कव्य को खाते
हैं। अतः ब्राह्मण से अधिक श्रेष्ठ कौन प्राणी होगा।