हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसकी अनोखी विशेषताएं
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1.96 भूतों में प्राणधारी जीव श्रेष्ठ है, प्राणियों में बुद्धिजीवी श्रेष्ठ है,
बुद्धिजीवियों में मनुष्य श्रेष्ठ है और मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है।
मनु ने ब्राह्मण के प्रथम श्रेणी में होने के पक्ष में कारण बताते हुए कहा है, चूंकि ईश्वर ने उसे सबसे पहले अपने मुख से पैदा किया है, ताकि देवताओं व पितरों को आहुति दी जा सके। मनु ब्राह्मण के सर्वोपरि होने का दूसरा कारण भी बताता है। वह कहता हैः
1.98 केवल ब्राह्मण की उत्पत्ति ही धर्म की नित्य देह है, क्योंकि धर्म की
रक्षा के लिए उत्पन्न ब्राह्मण मोक्षलाभ के योग्य होता है।
1.99 उत्पन्न होते ही ब्राह्मण पृथ्वी पर श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि वह
धर्म की रक्षा के लिए समर्थ होता है।
मनु इस प्रकार उपसंहार करता हैः
1.101 ब्राह्मण अपना ही खाता है अपना ही दान करता है, तथा दूसरे
व्यक्ति ब्राह्मण की दया से सबका भोग करते हैं। मनु आगे कहता हैः
1.100 विश्व में जो कुछ भी है, वह सब ब्राह्मण का है। अर्थात् ब्राह्मण
अच्छे कुल में जन्म लेने के कारण वास्तव में उन सबका अधिकारी होता है।
देवत्व से पूर्ण होने के कारण ब्राह्मण कानून और राजा के ऊपर होता है।
मनु आदेश देते हैंः
7.37 राजा प्रातःकाल उठकर ऋग्यजुसाम के ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मणों की
सेवा करें और उनके कहने के अनुसार कार्य करें।
11.35 शास्त्रोक्त कर्मों को करने वाला, पुत्र शिष्यादि का शासन करने वाला
प्रायश्चित विधि आदि को कहने वाला ब्राह्मण सबका मित्र रूप है, अतएव
उससे अशुभ वचन तथा रूखी बातें नहीं कहनी चाहिएं।
10.3 जाति की विशिष्टता से, उत्पति स्थान की श्रेष्ठता से, अध्ययन, अध्यापन
एवं व्याख्यान आदि के द्वारा नियम के धारण करने और यज्ञोपवीत संस्कार
आदि की श्रेष्ठता से सब वर्णों में ब्राह्मण ही वर्णों का स्वामी है।
ब्राह्मण या हिंदू समाज-व्यवस्था के महामानव को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं। प्रथमतः उसे फांसी नहीं दी जा सकती, भले ही उसने हत्या की हो। ख्1,
- यह निरापदता 1837 तक ब्रिटिश सरकार द्वारा जारी रखी गई। 1837 में दंड कानून में संशोधन किया
गया जिसमें पहली बार यह व्यवस्था की गई कि किसी हत्या के मामले में ब्राह्मण को दोषी पाए
जाने पर उसे मृत्यु दंड फांसी दी जा सकती है। यह निरापदता भारतीय राज्यों में अब भी विद्यमान है।
त्रावनकोर को दीवान जो ब्राह्मण है, उसने इस विशेषाधिकार को बनाए रखने के कारण जनता की
आलोचना से बचने के लिए चतुर तरीका अपनाया। उसने ब्राह्मण को फांसी देने के बजाए मृत्यु दंड
की सजा का प्रावधान को ही समाप्त कर दिया।