3. हिंदू समाज व्यवस्था : इसकी अनोखी विशेषताएं - Page 163

148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

थे, कुछ एक प्रजाति के ही थे, तथा कुछ दूसरी के। पुनः यह वर्ग-व्यवस्था मात्र समाज-व्यवस्था होती थी और उसकी धर्म द्वारा कभी भी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की गई और न ही कभी उसे पवित्र और सनातन बनाया गया। आधुनिक युग में उसकी अपनी व्यवस्था है कुछ में प्रजातंत्र है, कुछ में फासिस्ट है, कुछ नाजीवाद के हामी हैं तो कुछ में साम्यवाद है लेकिन यह व्यवस्था मात्र समाज-व्यवस्था है इसकी धर्म द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की गई और न ही इसे पवित्र और संशय रहित बनाया गया।

समाज ने अपने व्यवसायों (जीविकोपार्जन के उपायों) की कहीं भी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की है। आर्थिक क्रियाकलाप हमेशा ही धार्मिक पवित्रता की परिधि से बाहर रहे हैं। शिकारी समाज बिना किसी धर्म के नहीं रहा लेकिन शिकार करने को एक व्यवसाय के रूप में कभी प्रतिष्ठा नहीं दी, और न ही पवित्र बनाया गया। कृषि को भी व्यवसाय के रूप में धर्म द्वारा प्रतिष्ठित नहीं किया गया, और न ही पवित्रता का जाम पहनाया गया। चरवाहा समाज कभी भी बिना धर्म के नहीं रहा। किन्तु चरागाह कभी भी प्राण-प्रतिष्ठत नहीं किया गया और पवित्र नहीं बनाया गया। कुलीन और सामंत वर्ग तथा दास समाज में थे, किन्तु यह मात्र सामाजिक व्यवस्था थी। यह धर्म बंधनों से भिन्न थी।

हिंदू समाज में ही मानवीय संबंधों को धर्म का आवरण ओढ़ाकर अनुबंधनीय बना दिया गया है। हिंदूओं में कामगारों के परस्परिक संबंधों की भी सीमाएं बांध दी गई हैं। उन्हें कडि़यों और सनातन संशयहीनता के शिकंजे में कस दिया गया है।

अतः क्या यह कहना पर्याप्त नहीं है कि हिंदू ऐसे लोग हैं, जिनके धर्म की पवित्र संहिता है। ठीक ऐसे ही जरथूस्त, इजराइली, ईसाई तथा मुसलमान हैं। इन सबकी पवित्र संहिताएं हैं, से विश्वासों तथा संस्कारों को प्राण प्रतिष्ठित करते हैं तथा उन्हें पवित्र बनाते हैं लेकिन वे निर्धारित नहीं करते, न ही वे इंसान-इंसान के बीच के संबंध को मूर्त रूप में प्राण प्रतिष्ठित करते हैं और उसे पवित्र तथा अखंड बनाते हैं। इस मामले में हिंदू अनोखे हैं। यही बात है जिसने हिंदू समाज-व्यवस्था को समय के विप्लव और आक्रमण का सामना करने की दृढ़ शक्ति प्रदान की है।

कट्टर हिंदू यह स्वीकार करेगा कि हिंदू समाज-व्यवस्था का यह विशुद्ध विवरण है। केवल सुधारक ही तर्क-वितर्क कर सकता है। वह कहेगा कि अंग्रेजों के आने के बाद यह तो इतिहास की बात बन चुकी है। किसी को इस विचार से विचलित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ऐसा कहना प्रपंच है यह इस तथ्य को भूल जाते हैं कि जो संस्था संप्रदायों के रूप में लुप्त हो जाती है, यह आदतों के रूप में तो जीवित रहती ही है। कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि हिंदू समाज-व्यवस्था हिंदुओं की आदत बन गई है और यह पूरी तरह सजग है ऐसा होने के कारण यह जोरों पर है।