3. हिंदू समाज व्यवस्था : इसकी अनोखी विशेषताएं - Page 162

हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसकी अनोखी विशेषताएं

और परमात्व तत्व का अनुभव ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं। शूरवीरता,

तेज, धैर्य, चतुराई और युद्ध में भी न भागने का स्वभाव, दान और स्वामी

भव क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं। खेती, गौ-पालन और क्रय-विक्रय रूप,

सद्व्यवहार वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं और इसी प्रकार सब वर्णों की सेवा

करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।

कृष्ण हिंदू समाज-व्यवस्था के विरुद्ध प्रचार करने को निषिद्ध मानते हैं। वे कहते हैः

3.26 कार्य में संलग्न अनजान लोगों द्वारा कार्य करते रहने की इच्छा रखने

वाले बुद्धिमान व्यक्ति को लोगों को उनके काम में ही लगाए रखना चाहिए,

और कार्य में रत अनजात (मूर्ख) लोगों के विश्वास को नहीं तोड़ना चाहिए,

वरन्, स्वयं निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए उन्हें स्वयं सभी प्रकार के कार्यों में

लगाए रखना चाहिए।..... पूर्ण ज्ञान रखने वाला व्यक्ति इन अपूर्ण ज्ञान रखने

वाले लोगों का विश्वास नहीं तोड़े।

हिन्दू समाज-व्यवस्था के विफल हो जाने पर भी कृष्ण नहीं चाहते कि लोग उससे सुधार लाने का कार्य करें। वे कहते हैं कि वे यह कार्य उन पर छोड़ दें। भगवत्गीता की निम्नांकित भर्त्सना से बात यह बिल्कुल स्पष्ट हैः

कृष्ण के अनुसारः

4.7-8 हे! भारत, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है,

तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूं। मैं साधुओं की रक्षा तथा दुष्टों का नाश

करने और धर्म की स्थापना के लिए अलग-अलग युगों में जन्म लेता हूं।

हिंदू समाज-व्यवस्था की यह एकमात्र विशेषता नहीं है यह तो एक असाधारण विशेषता है प्राण-प्रतिष्ठा की समीक्षा से पता चलेगा कि ऐसे उदाहरण हैं कि समाज ने निर्जीव वस्तुओं की प्राण-प्रतिष्ठा की है और इसके अनुयायियों के दिमाग में यह धार्मिक विश्वास बिठाया है कि वे पवित्र हैं। ऐसे उदाहरण हैं जहां पत्थरों, नदियों, पेड़ों को देवी-देवता बना दिया गया है। ऐसे उदाहरण हैं, जहां समाज ने सजीव वस्तुओं की प्राण-प्रतिष्ठा की और समाज के लोगों के दिमाग में यह धार्मिक विश्वास बिठाया है कि वे पवित्र हैं। लेकिन ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि किसी विशिष्ट समाज-व्यवस्था की प्राण-प्रतिष्ठा की गई हो और उसे पवित्र बनाया गया हो। प्रारंभिक समाज की अपनी कुल देव-व्यवस्था थी। लेकिन कुल या जनजातीय व्यवस्था केवल समाज-व्यवस्था थी, धर्म द्वारा उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कभी नहीं की गई थी और न ही उसे कभी पवित्र तथा संशय रहित बनाया गया था। मिस्र, फारस, रोम, यूनान जैसे संसार के पुराने देशों में से हरेक की अपनी समाज-व्यवस्था थी जिसमें कुछ लोग स्वतंत्र होते थे तथा कुछ दास होते थे, कुछ नागरिक होते थे, कुछ संबद्ध होते