अध्याय 4
हिंदुत्व के प्रतीक
क्या हिंदुओं के सामाजिक संगठनों में कोई विलक्षण चीज है? विद्वानों द्वारा किए गए अन्वेषणों से अनभिज्ञ एक सीधा-सादा हिंदू तो यही कहेगा कि इसमें (हिंदू सामाजिक संगठन) कुछ भी आश्चर्यजनक, असामान्य या अप्राकृतिक नहीं है यह बिल्कुल स्वाभाविक है जो लोग अपने जीवन को अलग-थलग रह कर जीते हैं। वे कभी भी अपने तौर-तरीकों की विशिष्टताओं के प्रति सजग नहीं होते। लोग पीढ़ी-दर- पीढ़ी अबाध गति से स्वयं को नाम देते चले आ रहे हैं। लेकिन बाह्य व्यक्तियों, गैर-हिंदुओं को हिंदुओं का सामाजिक संगठन क्या खटकता है? क्या यह उन्हें वैसा ही सामान्य तथा स्वाभाविक दिखाई देता है, जैसा कि हिदुंओं को लगता है?
ईसा से लगभग 305 वर्ष पूर्व चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी राजा सिल्यूक्स निकेतार के राजदूत के रूप में भारत में आए मैगस्थनीज ने यह अनुभव किया कि हिंदुओं का सामाजिक संगठन बहुत ही विचित्र किस्म का है अन्यथा, उसने हिंदू समाज-संगठन की अजीब विशेषताओं का वण्रन करने में ऐसी गहन रुचि नहीं ली होती। उसने लिखा हैः
‘‘भारत की आबादी सात भागों में बंटी हुई है। दार्शनिक पहली श्रेणी में
आते हैं पर संख्या की दृष्टि से उनका वर्ग सबसे छोटा है। बलि चढ़ाने या
अन्य पवित्र धार्मिक संस्कार करने के इच्छुक लोगों द्वारा निजी तौर पर तथा
राजाओं द्वारा सार्वजनिक रूप से भी महाधर्म परिषद में उनकी सेवाओं का
उपयोग किया जाता है, जिसमें नव वर्ष के प्रारंभ में सभी दार्शनिक राजा
के द्वार पर एकत्रित हो जाते हैं जहां कोई भी दार्शनिक, जिसने लेखन के
क्षेत्र में महत्वपूर्ण व उपयोगी सुझाव दिए हैं या जिसने फसल तथा पशुओं
के उन्नयन के लिए या जनहित को बढ़ावा देने के लिए कोई टिप्पणी की
है, वह सार्वजनिक तौर पर इसकी घोषणा कर सकता है यदि यह पता लग
जाता है कि किसी ने तीन बार गलत सूचना दी है तो कानूनानुसार उसकी
भर्त्सना की जाती है और उसे उसके शेष जीवन के लिए चुप रहने का दंड
दिया जाता है। लेकिन यदि कोई उचित सलाह देता है तो उसे कराधान या