1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 18

अध्याय-1

हिंदुत्व का दर्शन

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हिंदुत्व का दर्शन क्या है? यह ऐसा प्रश्न है, जो अपनी तार्किक विचार श्रृंखला में उत्पन्न होता है। परंतु उसकी तार्किंक श्रृंंखला के अलावा भी इसका इतना महत्व है कि इसे बिना विचार किए छोड़ा नहीं जा सकता। इसके बिना हिंदुत्व के उद्देश्यों और आदर्शों को कोई भी समझ नहीं सकता।

इस संबंध में यह बिल्कुल साफ है कि इस तरह का अध्ययन करने से पहले विषय की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करना, और साथ ही उससे संबंधित शब्दावली को परिभाषित करना भी बहुत आवश्यक है।

आरंभ में ही यह सवाल पूछा जा सकता है कि इस प्रस्तावित शीर्षक का क्या अर्थ है? क्या ‘हिंदु धर्म का दर्शन’ और ‘धर्म का दर्शन’ शीर्षक एक समान है? मेरी इच्छा है कि इसके पक्ष और विपक्ष पर अपने विचार प्रस्तुत करूं। लेकिन वास्तव में मैं ऐसा नहीं कर सकता। इस विषय पर मैंने बहुत-कुछ पढ़ा है, लेकिन मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे ‘धर्म के दर्शन’ का स्पष्ट अर्थ अभी तक नहीं मिल पाया है। इसके पीछे शायद दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि धर्म एक सीमा तक निश्चित है लेकिन दर्शनशास्त्र में किन-किन बातों का समावेश किया जाए, यह निश्चित नहीं। ख्।, दूसरे, दर्शन और धर्म परस्पर विरोधी न भी हों, उनमें प्रतिस्पर्धा तो अवश्य ही है, जैसा कि दार्शनिक और अध्यात्मवादी की कहानी से पता चलता है। उस कहानी के अनुसार, दोनों के बीच चल रहे बाद-विवाद के दौरान, अध्यात्मवादी ने दार्शनिक पर यह दोषारोपण किया कि यह ‘एक अंधे पुरुष की तरह है, जो अंधेरे कमरे में एक

  1. मुनरो के इनसाइक्लोपीडिया ऑफ एजुकेशन में ‘फिलासफी’ शीर्षक के अंतर्गत लेख देखें।