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हिंदुत्व का दर्शन

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रूप से कार्यरत हैं, यद्यपि उनकी मूल उत्पत्ति उन महान धर्म गुरुओं के उपदेशों से होती है, जो एक दैवी साक्षात्कार के रूप में बोलते है। जाग्रत प्रयासों से उत्पन्न होने के कारण परिपूर्ण धर्म का दर्शन जानना और उसका वर्णन करना सरल है। हिंदू धर्म यहूदी, ईसाई तथा इस्लाम धर्मों के समान ही मुख्य रूप से एक परिपूर्ण धर्म है। उसके दैवी शासन को तलाश करने की आवश्यकता नहीं है। दैवी शासन ही हिंदुत्व की योजना को एक लिखित संविधान में स्थापित किया गया है। यदि कोई भी उसे जानना चाहे तो वह उस पवित्र पुस्तक को देख सकता है, जिसे मनुस्मृति के नाम से जाना जाता है। यह एक दैवी आचार-संहिता है, जिसमें हिन्दुओं के धार्मिक, शास्त्रोक्त तथा सामाजिक जीवन को नियंत्रित करने वाले नियमों का सूक्ष्म विवरण है, जिसे हिन्दुओं की बाइबिल माना जाना चाहिए और जिसमें हिंदू धर्म के दर्शन का समावेश है।

धर्म के दर्शन का तीसरा आयाम है, एक ऐसी कसौटी ख्1, निश्चित करना, जो धर्म का समर्थन-प्राप्त दैवी शासन की योजना मूल्यांकन करने के लिए उपयुक्त हो। धर्म को उस जांच की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। उसका मूल्यांकन किस कसौटी से होगा? इससे हम नियमों की परिभाषा निश्चित कर सकते हैं। इन तीनों आयामों में इस तीसरे आयाम की जांच करना और उसे निश्चित करना बहुत ही कठिन है।

हालांकि धर्म के दर्शन पर बहुत कुछ लिखा गया, लेकिन दुर्भाग्य से इस प्रश्न पर अधिक चिंतन नहीं किया गया और निश्चित रूप से इस समस्या के समाधान के लिए कोई उपाय नहीं ढूंढा गया। इस प्रश्न के समाधान के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपना रास्ता स्वयं तलाश करने को कहा गया है।

जहां तक मेरा संबंध है, मेरे विचार से इस मत का अनुसरण करके आगे बढ़ना उचित होगा कि यदि किसी भी आंदोलन अथवा संस्था का दर्शन जानना है, तब उस संस्था और आंदोलन के अंतर्गत जो क्रांतियां आई हैं, उनका आवश्यक रूप से अघ्ययन किया जाए। क्रांति दर्शन की जननी है, चाहे उसे दर्शन की जननी न भी

  1. धर्म-दर्शन के कुछ विद्यार्थी प्रथम दो परिमाणों के अघ्ययन को उसी प्रकार संबद्ध करते है, जिस प्रकार

धर्म-दर्शन के क्षेत्र में आवश्यक होता है। वे ऐसा महसूस करते प्रतीत नहीं होते कि तीसरा परिमाण

धर्म-दर्शन के अघ्ययन का आवश्यक भाग है। उदाहरणार्थ, हेस्टिंग्ज इनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन

एंड एथिक्स, खंड 12, पृष्ठ 393 पर एडम्स के ‘अघ्यात्मकवाद‘ शीर्षक के अंतर्गत लेख को देखे। मैं

इस विचार से सहमत नहीं हूं। मतभेद इसलिए है, क्योंकि मैं धर्म-दर्शन को एक सामान्य अध्ययन तथा

एक व्याख्यात्मक अघ्ययन मानता हूं। मैं नहीं समझता कि यहां सामान्य हिंदुत्व का दर्शन जैसी कोई

वस्तु हो सकती है। मेरा विश्वास है कि प्रत्येक धर्म का अपना विशेष दर्शन होता है। मेरे लिए धर्म का

कोई दर्शन नहीं है। यहां एक धर्म का एक दर्शन है।