8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विकास की प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं पर प्रभाव पड़ा है। ऐसा प्रतीत
होता है कि आदिमानव से लेकर आज तक सभ्यता की प्रत्येक अवस्था
में मूर्ति-पूजा वंश परंपरा से उनके सभी मिश्रित संस्कारों और समारोहों के
साथ चली आ रही है। लेकिन इस आधार पर ईश्वर के किसी भी रूप
की कल्पना करना संभव नहीं। मानवजाति के धार्मिक विचारों को इतिहास,
जिसे धार्मिक संस्थाओं ने साकार किया है, पृथ्वी के भौगोलिक इतिहास
के समान ही है, जिसमें नवीन और प्राचीन को साथ-साथ अथवा एक
तह पर दूसरी तह के समान रखा गया है।’’
भारत में ठीक ऐसा ही हुआ है। इस देश में धर्म का जो प्रचार-प्रसार हुआ है, इस संदर्भ में प्रो. मैक्समूलर ने कहा हैः
‘‘हमने धर्म को चरणबद्ध छोटे-छोटे बच्चों की सरल प्रार्थनाओं से लेकर
बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों की गहन तपस्या तक फलते-फूलते देखा है। वेदों
की अधिकांश ऋचाओं में हमें धर्म की बाल्यावस्था का पता चलता है,
तो ब्राह्मण ग्रंथों में उनके यज्ञादि, पारिवारिक तथा नैतिक आर्दशों में
व्यस्त यौवन परिलक्षित होता है। उपनिषद में वैदिक धर्म का वृद्धत्व नजर
आता है। भारतीय ज्ञान की ऐतिहासिक प्रगति में जब वे ब्राह्मण शास्त्रों
की परिपक्वता तक पहुंचे, तभी पूर्णतः बाल सुलभ प्रार्थनाओं का त्याग
करना आवश्यक था। भारतीय मेधा ऐतिहासिक प्रगति के साथ-साथ यज्ञ
के खोखलेपन और पुरातन देवताओं की सही पहचान हो गई। तब उनको
उपनिषदों के अधिक परिपूर्ण देवताओं से बदलना भी आवश्यक था। परंतु
ऐसा नहीं हो सका। भारत में प्रत्येक धार्मिक विचार, जिसे एक बार व्यक्त
किया गया, उसे कायम रखा गया और एक पवित्र वसीयत मानकर सौंपा
गया है, और साथ ही भारतीय राष्ट्र की बाल्यवस्था, यौवन तथा वृद्धावस्था,
इन तीनों अवस्थाओं के विचारों को प्रत्येक व्यक्ति की तीनों अवस्थाओं
का स्थायी भाव बना दिया गया है। एक ही आचार-संहिता, वेद, जिसमें
न केवल धार्मिक विचारों के विभिन्न पहलुओं का समावेश है, बल्कि ऐसे
सिद्धांत भी हैं, जिन्हें परस्पर विरोधी कहा जा सकता है।’’
पंरतु जो धर्म परिपूर्ण धर्म हैं, उनके संबंध में ऐसी कठिनाई अधिक परिलक्षित नहीं होती। परिपूर्ण धर्मों की मौलिक विशेषता यह है कि उनकी आदिकालीन धर्मों की तरह किसी अनजान ताकतों की गतिविधि के अंतर्गत वृद्धि नहीं होती, जो युगों-युगों से मौन