1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 29

14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इसलिए यह बात स्पष्ट है कि आदिम समाज और सभ्य समाज, दोनों एक बात पर सहमत हैं। दोनों में धर्म के हित का केंद्र बिंदु, यानी जीवन की वह प्रक्रिया, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की रक्षा होती है और उसके वंश का संचालन होता है, एक ही है। इस बात में दोनों में ही कोई वास्तविक अंतर नहीं है। परंतु अन्य दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनमें भेद है।

प्रथम, आदिम समाज के धर्म में ईश्वर की कल्पना का कोई भी अंश नहीं है। दूसरे, आदिम समाज के धर्म में नैतिकता और धर्म, इन दोनों में कुछ भी संबंध नहीं है। आदिम समाज में ईश्वर के बिना धर्म है। आदिम समाज में नैतिकता है, परंतु वह धर्म से स्वतंत्र है।

धर्म में ईश्वर की कल्पना का उदय कब और कैसे हुआ, यह कहना संभव नहीं है। यह तो हो सकता है कि ईश्वर की कल्पना का मूल समाज के महान व्यक्ति की पूजा में हो, जिससे मनुष्य की जीवित ईश्वर में श्रद्धा का, यानी किसी सर्वश्रेष्ठ को देखकर ईश्वर मानने के आस्तिकवाद का उदय हुआ होगा। यह हो सकता है कि ईश्वर की कल्पना, यह जीवन किसने बनाया है, जैसे दार्शनिक विचार के फलस्वरूप अस्तित्व में आई होगी, जिससे एक सृष्टि के निर्माणकर्ता के रूप में, उसे बिना देखे मानने से ईश्वरवाद का उदय हुआ होगा। चाहे कुछ भी हो, ईश्वर की कल्पना धर्म का एक अभिन्न अंग नहीं है। उसका संबंध धर्म के साथ कैसे जुड़ गया, यह बताना मुश्किल है। जहां तक धर्म और नैतिकता का संबंध है, यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है। यद्यपि धर्म और ईश्वर का सर्वथा अभिन्न संबंध नहीं है, परंतु धर्म और नैतिकता, दोनों का अभिन्न संबंध है। जीवन, मृत्यु और विवाह, इन मानव-जीवन की मौलिक वास्तविकताओं से धर्म और नैतिकता, दोनों का संबंध है। जीवन की उन मौलिक वास्तविकताओं तथा उनकी क्रियाओं-प्रक्रियाओं को उत्सर्गित करने के साथ-साथ उसने उनकी रक्षा के लिए समाज द्वारा बनाए गए नियमों को भी उत्सर्गित किया है। इस प्रश्न को इस दृष्टिकोण से देखने के बाद इस बात की व्याख्या आसान हो जाती है कि धर्म और नैतिकता का संबंध कैसे स्थापित हुआ। यह संबंध धर्म और ईश्वर के बीच स्थापित संबंध से भी अधिक स्वाभाविक और दृढ़ है। परंतु फिर भी धर्म और नैतिकता, इन दोनों का मिलन निश्चित रूप से कब हुआ, यह बताना कठिन है।

  1. यह कि ईश्वर की कल्पना का उदय इन दोनों दिशाओं से हुआ है, इसे हिंदू धर्म द्वारा भली-भांति दर्शाया

गया है। इंद्र और ब्रह्मा की कल्पना की तुलना ईश्वर से करें।