हिंदुत्व का दर्शन
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चाहे कुछ भी हो, यह वस्तुस्थिति है कि सभ्य समाज का धर्म और आदिम समाज के धर्म दो महत्वपूर्ण कारणों से भिन्न-भिन्न हैं। सभ्य समाज में ईश्वर का धर्म की योजना में समावेश है। सभ्य समाज में नैतिकता को धर्म के कारण पवित्रता प्राप्त होती है।
मैं जिस धार्मिक क्रांति की बात कर रहा हूं, उसकी यह प्रथम अवस्था है। धार्मिक क्रांति की प्रक्रिया धर्म के विकास में इन दो तत्वों के उभरने के साथ ही समाप्त हो गई, ऐसा मानना उचित नहीं है। यह दोनों विचारधाराएं सभ्य समाज के धर्म का एक हिस्सा बन जाने के बाद और अधिक परिवर्तित हुईं, जिसके कारण उनके अर्थों में तथा उनके नैतिक महत्व में क्रांति हो गई। धार्मिक क्रांति की दूसरी स्थिति में बहुत मौलिक परिवर्तन हो गए। यह भेद इतना विशाल है कि उसके कारण सभ्य समाज, प्राचीन समाज और आधुनिक समाज में विभाजित हो गया और जब हम सभ्य समाज के धर्म की बात करते हैं, तब प्राचीन समाज और आधुनिक समाज के धर्म की चर्चा करना आवश्यक बन जाता है।
प्राचीन समाज को आधुनिक समाज से अलग करने वाली धार्मिक क्रांति, सभ्य समाज को आदिम समाज से अलग करने वाली धार्मिक क्रांति से बहुत ही विशाल है। उसकी व्यापकता, ईश्वर, समाज और मनुष्य के बीच संबंधों के बारे में इसके द्वारा जो धारणाएं बनीं, उनके भेदों से स्पष्ट होती है।
इस भेद का पहला मुद्दा समाज की रचना से संबंधित है।
प्रत्येक मनुष्य अपनी पसंद से नहीं, बल्कि अपने जन्म तथा पालन-पोषण के कारण किसी समाज का, जिसे नैसर्गिक समाज कहा जाता है, सदव्य बनता है। वह किसी विशिष्ट परिवार से तथा किसी विशिष्ट राष्ट्र से संबंधित होता है। इस सदस्यता के कारण उस पर कुछ निश्चित सामाजिक उत्तरदायित्व तथा कर्तव्य भी लादे जाते हैं। उनकी पूर्ति करना उसके लिए अनिवार्य होता है और उनके उल्लंघन से उसे सामाजिक दृष्टि से अयोग्य मानकर दंड दिया जाता है, जब कि उसी के साथ उसे कुछ अधिकार तथा सुविधाएं भी प्रदान की जाती हैं। इस संदर्भ में प्राचीन तथा आधुनिक, दोनों समाज समान हैं। परंतु जैसा कि प्रो. स्मिथ ने कहा है ख्1, ः
‘‘यहां यह महत्वपूर्ण भेद है कि संसार की आधुनिक व्याख्या के संदर्भ में
प्राचीन संसार का आदिम समाज अथवा राष्ट्रीय समाज वस्तुतः एक नैसर्गिक
- दि रिलीजन ऑफ सैमाइट्स