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हिंदुत्व का दर्शन

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यह पूछ सकता है कि वह नियम कहां हैं और वे क्या हैं? उपरोक्त चर्चा में शायद पाठक को इन नियमों का उनके नाम से उल्लेख नहीं मिला होगा। परंतु यह बात उसके ध्यान में आएगी कि यह संपूर्ण धार्मिक क्रांति, क्या सही है और क्या गलत है, इन मानदंडों को परखने के इर्द-गिर्द ही घूम रही थी। यदि वह इस बात को नहीं समझता, तो मुझे उस बात को सुस्पष्ट करने दिया जाए, जो इस सारी चर्चा में अस्पष्ट है। हमने अपनी चर्चा प्राचीन समाज तथा आधुनिक समाज में जो अंतर है, उससे आरंभ की थी, और जैसा कि हमने देखा है, उन्होंने अपने धार्मिक आदर्श के रूप में दैवी शासन की जिस योजना को स्वीकार किया, उसमें भिन्न्ता है। क्रांति के एक सिरे पर वह प्राचीन समाज है, जिसके धार्मिक आदर्श का लक्ष्य उसका समाज था। क्रांति के दूसरे सिरे पर वह आधुनिक समाज है, जिसके धार्मिक आदर्श का लक्ष्य एक व्यक्ति था। इन्हीं तथ्यों को यदि हम नियमों में ढाल दें, तो हम कह सकते हैं कि प्राचीन समाज के लिए सही अथवा गलत बात को परखने के लिए जो नियम अथवा कसौटी थी, वह थी ‘‘उपयोगिता’’, जब कि आधुनिक समाज के लिए यह ‘न्याय’ है। इस प्रकार, जिस समाज में केंद्रीय भावना समाज से व्यक्ति में बदल गई, वह एक प्रकार की नियमों की क्रांति थी।

मैंने जो नियम सूचित किए हैं, शायद कुछ लोग उसका विरोध करें। कदाचित, यह उनके लिए एक नया रास्ता होगा। परंतु मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि धर्म के दर्शन को परखने के लिए यही वास्तविक नियम है। पहली बात, यह नियम लोगों को, मनुष्य के आचरण में क्या सही और क्या गलत है, यह परखने योग्य बनाए_ दूसरे, यह नियम, नैतिक उत्तमता जिससे बनी है, उसकी वर्तमान धारणाओं के अनुरूप हो। इन दोनों दृष्टिकोणों से वे नियम सही दिखाई देते हैं। क्या सही है और क्या गलत है, ये नियम हमें यह परखने की योग्यता देते हैं। जिस समाज ने उनको स्वीकार किया है, यह नियम उसके अनुरूप ही हैं क्योंकि वहां लक्ष्य था। समाज और सामाजिक उपयुक्तता को ही नैतिक आचरण माना जाता था। न्याय, यह कसौटी आधुनिक समाज के अनुरूप है, जिसमें व्यक्ति को लक्ष्य माना गया है और उस व्यक्ति को न्याय मिले, इसे ही नैतिक उत्तमता माना गया है। यह विवाद का विषय हो सकता है कि इन दो प्रकार के नियमों में से कौन-सा नियम नैतिक दृष्टि से श्रेष्ठ है। परंतु मैं नहीं सोचता कि यह नियम नहीं है, इस बात पर कोई गंभीर विवाद हो सकता है। यह कहा जा सकता है कि यह नियम श्रेष्ठ नहीं है। इस पर मेरा उत्तर यह है कि धर्म के दर्शन को परखने के नियम दैवी होने के साथ-साथ प्राकृतिक भी होने चाहिएं। कोई कुछ भी कहे, हिंदुत्व के दर्शन का परीक्षण करने के लिए मैं इन्हीं नियमों को स्वीकार करना चाहूंगा।