28 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
II
यह एक बहुत ही लंबी घुमावदार प्रक्रिया है, परंतु मुख्य विषय की छानबीन करने से पूर्व यह एक आवश्यक प्राथमिकता थी फिर भी, जब हम अन्वेषण की यह प्रक्रिया आरंभ करते हैं, तो हमारे सामने कुछ आरंभिक कठिनाई आती हैं। हिंदू ऐसी जांच-पड़ताल का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं। वे कहते हैं कि या तो धर्म उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं है अथवा वे इस विचार की ओट ले लेते हैं-जिसे तुलनात्मक धर्म के अध्ययन से पुरस्कृत किया है-कि सभी धर्म अच्छे हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि ये दोनों ही मत गलत और निराधार हैं।
धर्म एक सामाजिक शक्ति है, इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती। हेबर्ड स्पेंसर ने धर्म की अत्यंत सार्थक व्याख्या की है, जिसके अनुसार, ‘किसी जाल की बुनाई में यदि इतिहास को ताना माना जाए तो धर्म एक ऐसा बाना है, जो उसके प्रत्येक स्थान पर आड़े आता है।’ यह एक सच्चाई है, जो प्रत्येक समाज से संबंधित है। परंतु भारतीय इतिहास के ताने को धर्म न केवल हर स्थान पर बाना बनकर आड़े आता है, बल्कि हिंदु मन के लिए वह ताना भी है और बाना भी। हिंदू जीवन में धर्म उसके प्रत्येक क्षण को नियमित करता है। वह उसे आदेश देता है कि अपने जीवनकाल में कैसा आचरण करें, तथा उसकी मृत्यु के उपरांत उसके शरीर का क्या किया जाए। धर्म उसे यह बताता है कि स्त्री के साथ मिलने वाला सुख कब और कैसे प्राप्त करें। जब बच्चा पैदा हो जाए, कौन-कौन से धर्मानुष्ठान किए जाने हैं-उसका क्या नाम रखा जाए, उसके सिर के बाल कैसे काटे जाएं, उसको पहला भोजन कैसे कराया जाए, वह कौन-सा व्यवसाय करे, किस स्त्री के साथ विवाह करे, यह बात उसे धर्म बताता है। वह किसके साथ भोजन करे, कौन-सा अन्न
खाए, कौन-सी सब्जी विधिवत् है और कौन-सी निषिद्ध, उसकी दिनचर्या कैसी हो, कितनी बार वह भोजन करे और कितनी बार प्रार्थना करे, धर्म इन सबका नियमन करता है। हिन्दू का ऐसा कोई कार्य नहीं, जिसका धर्म में अंतर्भाव न हो अथवा जिसके लिए धर्म का आदेश न हो। यह बहुत विचित्र प्रतीत होता है कि शिक्षित हिंदू इस बात को अधिक महत्व नहीं देता, मानो यह कोई उपेक्षा की बात हो।
इसके अलावा, धर्म एक सामाजिक शक्ति है। जैसा मैंने पहले स्पष्ट किया है, धर्म दैवी शासन की योजना का समर्थन करता है। यह योजना समाज के अनुसरण के लिए एक आदर्श बन जाती है। आदर्श अस्तित्वहीन हो सकता है, इस अर्थ में कि इसकी रचना अभी की जानी है। यद्यपि वह अस्तित्वहीन है, परंतु वास्तविक है क्योंकि, जैसे प्रत्येक आदर्श में कोई कार्य प्रवण शक्ति निहित होती है, उसी