38 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
8.379. पुरोहित वर्ग के व्यभिचारी को प्राण-दंड देने की बजाए उसका अपकीर्तिकर मुंडन करा देना चाहिए तथा इसी अपराध के लिए अन्य वर्गों को मृत्य-दंड तक दिया जाए।
8.380. राजा समस्त पाप करने वाले ब्राह्मण का भी वध कभी न करे, किन्तु संपूर्ण धन के साथ अक्षत उसे राज्य से निर्वासित कर दे। 11.126. क्षत्रिय वर्ग के किसी सदाचारी मनुष्य की जानबूझ कर हत्या करने पर किसी ब्राह्मण की हत्या के लिए जो दंड दिया जाता है, उसका एक चौथाई दंड होगा। वैश्य की हत्या के लिए उसका आठवां भाग और शूद्र की हत्या के लिए, जो निरंतर अपने कर्तव्य का पालन करता है, उसका सोलहवां भाग।
11.127. बिना द्वेष-भाग के यदि ब्राह्मण किसी क्षत्रिय की हत्या कर देता है, तो उसे उसके सभी धार्मिक संस्कारों को करने के बाद पुरोहित को एक बैल और एक हजार गाय देनी चाहिए।
11.128. अथवा संयमी तथा जटाधारी होकर ग्राम से अधिक दूर पेड़ के नीचे निवास करता हुआ तीन वर्ष तक बह्म-हत्या के प्रायश्चित को करे। 11.129. सदाचारी वैश्य का बिना कारण वध करने वाला ब्राह्मण इसी प्रायश्चित को एक साल तक करे अथवा एक बैल के साथ सौ गायों को पुरोहित को दे।
11.130. बिना इरादे के शूद्र का वध करने वाला ब्राह्मण छह मास तक इसी वृत्त को करे अथवा एक बैल और दस सफेद गाएं पुरोहित को दे। 11.381. ब्राह्मण-वध के समान पृथ्वी पर दूसरा कोई बड़ा पाप नहीं है, अतएव राजा मन से भी कभी ब्राह्मण का वध करने का विचार न करे। 8.126. एक ही प्रकार के बार-बार होने वाले अपराधों पर विचार करते हुए और उसका स्थान तथा समय निश्चित करते हुए अपराधी को दंड देने की अथवा सजा भुगतने की पात्रता को देखते हुए राजा को केवल उन लोगों को ही सजा देनी चाहिए, जो उसके लिए पात्र हैं।
8.124. ब्रह्मा के पुत्र मनु ने तीन कनिष्ठ वर्गों के विषय में दंड के दस स्थानों को कहा है और ब्राह्मण को पीड़ारहित अर्थात् बिना किसी प्रकार दंडित किए केवल राज्य से निकाल दिया जाता है।
8.125. जनन्द्रिय का एक भाग पेट, जबान, दो हाथ, और पांचवां दो पांव, आंखें, नाक, दोनों कान, संपत्ति और मृत्यु-दंड के लिए संपूर्ण शरीर सजा के स्थान हैं।