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हिंदुत्व का दर्शन

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हिंदु तथा गैर-हिंदू आपराधिक न्याय-शास्त्र में कितना विलक्षण अंतर है? अपराध के लिए दंड देते हुए हिंदू धर्म-शास्त्रों में कितनी विशाल असमानता लिखी गई है? न्यायदान की भावना-भरे कानून में हमें दो बातें मिलती हैं। एक भाग, जिसमें अपराध की व्याख्या तथा उसे भंग करने वाले को न्यायोचित दंड देने की व्यवस्था है और दूसरा, वह नियम कि एक ही प्रकार का अपराध करने वाले को एक समान दंड होगा। परंतु हम मनु में क्या देखते हैं? पहला, अविवेकी दंड देने की पद्धति। मनुष्य के शरीर के अवयवों जैसे पेट, जबान, नाक, आंखें कान, जननेन्द्रिय आदि को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व मानकर तथा यह कहकर कि वे आज्ञा पालन नहीं करते, अपराध के लिए इन अवयवों को काटने की सजा दी जाती है, मानों वे अपराध में शामिल हों, मनु के अपराध-कानून की दूसरी विशेषता है सजा देने का अमानवीय स्वरूप, जिसका अपराध की गंभीरता से कोई संबंध नहीं है। परंतु इन सबसे अधिक मनु के कानून की विलक्षण विशेषता, जो पूर्ण रूप से नग्न होकर उभरती है, वह है एक अपराध के लिए सजा देने में असमानता। यह असमानता केवल अपराधी को सजा देने के लिए ही तैयार नहीं की गई है, परंतु जो लोग न्याय प्राप्त करने के लिए न्याय-मंदिरों में जाते हैं, उनके अस्तित्व तथा प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए भी उसका निर्माण किया गया है। दूसरे शब्दों में, सामाजिक असमानता, जिस पर इसकी संपूर्ण योजना स्थित है, उसे बनाए रखने के लिए कानूनों का निर्माण किया गया है।

अब तक मैंने केवल ऐसे उदाहरण ही लिए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि मनु ने किस प्रकार से सामाजिक असमानता बनाने और उसे जारी रखने में मदद की। परंतु अब मैं मनु द्वारा प्रयुक्त किए गए ऐसे मसले उठाना चाहूंगा, जो यह स्पष्ट करते हैं कि मनु ने धार्मिक असमानता का निर्माण भी किया। यह ऐसे मसले हैं, जिनका संबंध उन बातों से है, जिसे आश्रम तथा धर्म-विधि (संस्कार) कहा जाता है।

हिंदुओं का ईसाइयों की तरह धर्म-संस्कारों पर विश्वास है। उनमें केवल एक ही अंतर है कि हिन्दुओं में इतने अधिक धर्म-संस्कार हैं जिसे उनकी संख्या देकर रोमन कैथेलिक ईसाई भी आश्चर्यचकित हो जाएंगे। आरंभ में इन धार्मिक विधियों की संख्या केवल 40 थी और उनका मनुष्य के जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों से लेकर, छोटी-छोटी बातों से संबंध था। पहले उनकी संख्या बीस तक कम की गई। बाद में घटाकर सोलह कर दी गई और उस संख्या पर हिंदुओं के धर्म-संस्कार स्थिर हो गए हैं।

इन धार्मिक संस्कारों के मूल में असमानता की भावना किसी हद तक अभिव्यक्त हुई है, इस बात को स्पष्ट करने के पूर्व पाठकों को इस बात का ज्ञान अवश्य होना चाहिए कि यह नियम क्या हैं। सभी नियमों का परीक्षण करना असंभव है। उनमें से कुछ नियमों को जानना ही पर्याप्त होगा। मैं केवल तीन प्रकार के नियमों का ही