1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 81

66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हेतु वशिष्ठ को आमंत्रित किया गया। परंतु उसने इस कार्य को असंभव बतलाया। इस पर त्रिशंकु ने दक्षिण की यात्रा की, जहां वशिष्ठ के सौ पुत्र तपस्या कर रहे थे। उसने उनसे भी वही कार्य करने की प्रार्थना की, जिसे उनके पिता ने करने में इंकार कर दिया था। यद्यपि उसने उनको बहुत ही आदर तथा नम्रता के साथ संबोधित किया और यह भी कहा कि इक्ष्वाकु उन्हें अपना पारिवारिक पुरोहित तथ कठिन समय में सबसे बड़ा सहारा मानता था। वह स्वयं भी उन्हें अपना संरक्षक कुल देवता मानता है। इसके बावजूद भी इन पुरोहितों से उसे ऐसी फटकार मिलीः ‘अक्षम्य, मूर्ख, तुम्हें सत्य बोलने वाले हमारे गुरु ने इंकार किया है। तब उसके इंकार को न मानते हुए तुम दूसरी शाखा के पास कैसे जा सकते हो? कुल पुरोहित सभी इक्ष्वाकु लोगों के लिए एक श्रेष्ठ दैवी उपदेशक हैं और उस सत्यवादी व्यक्तित्व की आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। उस दिव्य ऋषि ने घोषित किया कि यह संभव नहीं है। फिर हम ऐसा यज्ञ कैसे कर सकते हैं? तुम मूर्ख राजा हो। अच्छा यही है कि तुम वापस अपनी राजधानी लौट जाओ। तीनों संसार के पुरोहित वशिष्ठ का हम अनादर कैसे कर सकते हैं?’ तब त्रिशंकु ने उन्हें समझाया कि अगर उसके गुरु तथा गुरु के पुत्रों ने उसकी यह प्रार्थना मानने से इंकार कर दिया, तब वह दूसरा रास्ता अपनाने के बारे में विचार कर सकता है। अपने इसी विचार को व्यक्त करने का परिणाम राजा त्रिशंकु को भुगतना पड़ा। उसे चांडाल बनने का शाप दे दिया गया। जैसे ही उस पर शाप का प्रभाव होने लगा, राजा का रूप एक पतित अछूत में बदलने लगा। तब यह विश्वामित्र के पास (जो उस समय दक्षिण में रहता था) अपने गुणों व ईश्वरीय भक्ति का वर्णन और अपनी दुर्दशा पर विलाप करते हुए सहायता के लिए दौड़ा। विश्वामित्र को उसकी यह अवस्था देखकर वास्तव में ही दया आई और चांडाल के ही रूप में उसे सीधे स्वर्ग भेजने का वचन दिया। उसने कहा, ‘स्वर्ग अब तुम्हारे ही अधिकार में है क्योंकि तुम कुशिक के पुत्र की शरण में आए हो’’ बाद में उसने यज्ञ की तैयारी करने तथा समारोह में वशिष्ठ के परिवार सहित सभी ऋषियों को आमंत्रित करने के आदेश दिए। विश्वामित्र के शिष्यों ने, जिन्होंने वशिष्ट के लोगों तक उसका यह संदेश पहुंचाया, वापस लौटकर बताया, ‘आपका संदेश सुनने के बाद सभी देशों के ब्राह्मण यहां एकत्रित हो गए हैं, परंतु वशिष्ठ नहीं आए।’ वशिष्ठ के सौ पुत्रों ने क्रोध में कांपते हुए हुआ थाः ‘देवता और ऋषि, चांडाल के यज्ञ को कैसे सम्पन्न कर सकते हैं? वह भी तब, जब उस यज्ञ का पुरोहित कोई क्षत्रिय हो। किसी चांडाल का अन्न खाकर तथा विश्वामित्र को यह सब जानकार बहुत क्रोध आया। उसने वशिष्ठ और उसके पुत्रों को जलकर राख होने और फिर उसे सौ जन्मों के लिए पतित नीचे और वशिष्ठ को निषाद के रूप में पुनर्जन्म लेने का शाप दिया। यह जानने पर कि शाप ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया विश्वामित्र ने त्रिशंकु की प्रशंसा करते हुए वहां एकत्रित ऋषियों को यज्ञ करने को कहा। विश्वमित्र के उस भायनक क्रोध के कारण दूसरे ऋषियों ने उसकी बात मान ली। विश्वामित्र ने यज्ञ में स्वयं यज्ञक का