1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 80

हिंदुत्व का दर्शन

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उठा और उसने वशिष्ठ के आश्रम को ध्वस्त कर दिया और आश्रमवासियों को वहां से भाग जाने को विवश कर दिया। तब विश्वामित्र को धमकी देते हुए वशिष्ठ ने अपनी ब्राह्मण-शक्ति से युक्त गदा उठाई। विश्वामित्र ने भी अपने शस्त्र उठाते हुए विरोधी को सामने आने के लिए कहा। वशिष्ठ ने उसे अपनी शक्ति दिखाने को ललकारा और कहा कि वह अभी उसके घमंड को चूर-चूर कर देगा। उसने कहाः ‘क्षत्रिय की सामर्थ्य और किसी महान ब्राह्मण की सामर्थ्य में कैसे तुलना हो सकती है? अरे देखो, नीच क्षत्रिय, मेरी दिव्य ब्राह्मण शक्ति’।

जैसे पानी से लिपटकर अग्नि बुझ जाती है, उसी प्रकार उस गाधि के पुत्र विश्वामित्र का वह भयानक शस्त्र ब्राह्मण वशिष्ठ की गदा से नष्ट हो गया। इस प्रकार बाद में एक-एक कर विश्वामित्र ने अनेक तरह के अग्नि बाण, विष्णु का चक्र और शिव का त्रिशूल आदि वशिष्ठ की तरफ फेंके, पर वह सभी को अपनी गदा से नष्ट कर देता था। अंत में देवताओं को भी भयभीत करने वाला बह्मशस्त्र विश्वामित्र ने छोड़ा लेकिन वह भी उस ब्राह्मण ऋषि के सामने निष्फल हो गया। वशिष्ठ ने अन्यंत ही भयानक रूप धारण कर लिया। उसके शरीर के छिद्रों से धुएं के साथ अग्नि निकली। उसके हाथ में वह गदा धरती पर प्रचंड अग्नि के रूप में भड़की। उस समय वह यम का ही दूसरा रूप बन गया था। बाद में अनेक मुनियों के कहने पर वशिष्ठ ने मन में आई बदले की भावना का परित्याग कर दिया। जब विश्वामित्र ने कराहते हुए कहाः ‘क्षत्रिय की शक्ति को धिक्कार है, ब्राह्मण का बल ही वास्तविक शक्ति है, एक अकेले ब्राह्मण की गदा ने उसके सारे शस्त्र नष्ट कर दिए।’ अब कोई विकल्प नहीं बचा। या तो वह उस असहाय स्थिति से संतुष्ट रहे या फिर ब्राह्मण के उस शक्तिशाली पद तक पहुंचने के लिए प्रयास करे। लेकिन उसने दूसरे रास्ते को ही स्वीकार किया। अपनी इंद्रियों तथा मन पर नियंत्रण रखते हुए ब्राह्मण पद तक पहुंचने के उद्देश्य से घोर तपस्या करने के लिए वह अपने शत्रु से निरस्कृत और दुःखी होकर अपनी रानी के साथ दक्षिण की यात्रा पर चला गया। वहां जाकर उसने अपना संकल्प पूरा किया और उसके बाद हमें बताया गया कि उसने हवीशयनंद, मधुसियानंद और द्रिधनेत्र नाम के तीन पुत्र जन्मे। एक हजार साल के अंत में ब्रह्मा प्रकट हुआ और घोषणा की कि उसने स्वर्ग जीत लिया है और उसकी घोर तपस्या के फलस्वरूप राजर्षि का पद प्राप्त कर लिया है। अत्यंत दुःखी और लज्जित होकर विश्वामित्र कहते हैं - ‘यद्यपि मैंने घोर तपस्या की फिर भी देवता और ऋषि मुझे केवल राजर्षि ही मानते हैं, ब्राह्मण नहीं।’ इन्हीं व्यक्तियों अथवा इस नाम के विभिन्न व्यक्तियों का जो विवरण प्राप्त है, उस पर विवाद है, लेकिन उसका विषय भिन्न है।

इक्ष्वाकु के वंशजों में से एक राजा त्रिशंकु ने एक ऐसे यज्ञ-समारोह करने की योजना बनाई थी, जिसके द्वारा वह अपने शरीर के साथ सीधे स्वर्ग में जा सकता था। इस कार्य