68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यज्ञ के समाप्त होने पर जब सभी देवता और ऋषि चले गए, तब विश्वामित्र ने अपने भक्तों से कहा, ‘दक्षिण की यह घटना हमारी तपस्या में बाधा बन गई है। हमें किसी अन्य दिशा में जाकर तपस्या करनी चाहिए।’ इस तरह वह पश्चिम में किसी जंगल में चला गया और वहां उसने अपनी तपस्या फिर से आरंभ की। यहां पर फिर से एक अन्य घटना से अवरोधा उत्पन्न होता है। यह कहानी राजा अंबरीष की है जो रामायण के अनुसार अयोध्या का राजा था। वह इक्ष्वाकु का 28वां और त्रिशंकु का 22वां वारिस था। विश्वामित्र को इन दोनों राजाओं का समकालीन माना गया है। इस कथा के आधार पर अंबरीष एक यज्ञ-समारोह में व्यस्त था। तब इंद्र उसकी बलि उठाकर ले गया। पुरोहितों ने कहा कि ‘यह अशुभ घटना राजा के भ्रष्ट शासन के कारण हुई। इसके लिए कोई मानव-बलि देकर बड़ा प्रायशित कर लेना चाहिए।’ एक लंबी खोज के बाद वह राजर्षि (अंबरीष) एक ब्राह्मण ऋषि ऋचिका के पास पहुंचा, जो भृग का वंशज था। उसके पुत्रों में से एक पुत्र की बलि देने के लिए (एक सौ हजार गायों की कीमत के बदले में बचने के लिए) कहा। ऋचिका ने उत्तर दिया - वह अपना ज्येष्ठ पुत्र नहीं बेच सकता_ और उसकी पत्नी ने कहा - वह अपना कनिष्ठ पुत्र नहीं बेचेगी। उसने कहा कि ज्येष्ठ पुत्र पिता और कनिष्ठ पुत्र मां को प्रिय होता है। ऋचिका के दूसरे पुत्र सुनस्सेप ने कहा कि तब मैं अपने-आपको बेचने योग्य मानता हूं, और उसने राजा से कहा कि वह उसे ले जाए। उसके बदले में एक सौ हजार गाय तथा एक सौ लाख स्वर्ण मुद्राएं और रत्नों के अनेक भंडार के रूप में उसकी कीमत चुका कर राजा सुनस्सेप को अपने साथ ले गया। जब वे पुस्कर वन से गुजर रहे थे, सुनस्सेप की अपने मामा विश्वामित्र से भेंट हो गई, जो वहां अन्य ऋषियों के साथ तपस्या कर रहा था। सुनस्सेप उसकी गोद में जा गिरा और उसने अपने आपको अनाथ बताकर सहायता मांगी और कहा कि वह उसका आश्रय चाहता हैं। विश्वामित्र ने उसे शांत किया और उसके स्थान पर अपने पुत्रों को बलि बनने के लिए कहा। इस प्रस्ताव को मधुशानंद तथा उसके अन्य पुत्रों ने नहीं माना। उन्होंने उपहास के स्वर में कहाः ‘वह अपने ही पुत्रों की बलि देकर दूसरों को कैसे बचाना चाहता हैं? वे इसे गलत माने हैं।’ अपनी आज्ञा का अनादर होने के कारण ऋषि बहुत ही क्रोधित हो गए और उन्होंने वशिष्ठ के पुत्रों के समान अपने पुत्रों को भी सबसे पतित वर्णों में जन्म लेने और एक हजार वर्षों तक कुत्ते का मांस खाने का शाप दिया। तत्पश्चात् उसने सुनस्सेप से कहाः ‘जब तुझे पवित्र धागे से लाल माला पहनाकर तथा तेलों का अभिलेप करके विष्णु के बलिदान के खंबे से बांधा दिया जाए, तब अग्नि की प्रार्थना करो और अंबरीष के यज्ञ में इन दो दैवी गाथाओं की स्तुति करो। तुम्हारी कामना की पूर्ति हो जाएगी।’ उन गाथाओं को प्राप्त करने के बाद सुनस्सेप ने राजा अंबरीष को तत्काल अपने इष्ट प्रदेश पहुंचने का सुझाव दिया। बाद में लाल वस्त्र पहने हुए जब