1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 84

हिंदुत्व का दर्शन

69

उसे बलि के स्थान पर बांध दिया गया, तब उसने इंद्र और उसके छोटे भाई (विष्णु) की उन सर्वोत्तम गाथाओं द्वारा आराधना की। हजार नेत्र वाला इंद्र उसकी पवित्र गाथा सुनकर प्रसन्न हो गया और उसने सुनस्सेप की दीर्घायु कर दिया। राजा अंबरीष ने भी इस यज्ञ द्वारा बड़े लाभ प्राप्त किए। इस बीच, विश्वामित्र ने अपनी तपस्या जारी रखी तो एक हजार वर्ष तक चलती रही। तपस्या की समाप्ति पर देवता उसे वरदान देने के लिए आए_ और ब्रह्मा ने उद्घोषणा की कि उसने ऋषि का पद प्राप्त किया है। इस प्रकार वह एक कदम और आगे हो गया। लेकिन इससे असंतुष्ट होकर मुनि ने अपनी तपस्या फिर से आरंभ की। कुछ समय बाद उसने मेनका को देखा, जो पुष्कर सरोवर में स्नान करने के लिए आई थी। मेनका अपूर्व सौंदर्य की जीती-जागती मूर्ति थी। उसने अपने आकर्षक रूप की चकाचौध से विश्वामित्र को विमोहित कर दिया। उसने आकर्षण की ज्वाला में दग्ध मुनि ने अपनी सहचरी बनने के लिए उसे कुटिया में बुलाया। इस तरह से दस वर्षों तब वह मेनका के मायाजाल में फंसा रहा, जो उसकी तपस्या के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। इन दस वर्षों में उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे इस बात का भी पता चल गया कि यह सब षड्यंत्र उसकी तपस्या भंग करने के लिए था। अतः मेनका (अप्सरा) को विदा कर वह स्वयं भी उत्तर में पहाड़ों पर चला गया, जहां उसने एक हजार वर्षों तक कोसिकी नदी के किनारे घोर तपस्या की। उसकी तपस्या को देखकर देवता चिंतित हुए और उन्होंने निर्णय लिया कि उसे महान ऋषि (महर्षि) की उपाधि देकर सम्मानित किया जाए और ब्रह्मा ने सभी देवताओं के परामर्श को स्वीकार करते हुए बतलाया कि विश्वामित्र को महार्षि की पदवी प्रदान की गई है। विश्वामित्र ने हाथ जोड़ नतमस्तक होकर कहा कि ‘यदि उसे ब्राह्मण-ऋषि की अपूर्व उपाधि प्रदान की जाए, तभी वह मानेगा कि उसने अपनी इंद्रियों पर संपूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लिया है। इस पर ब्रह्मा ने उत्तर दिया कि अभी उसने अपनी इंद्रियों पर पूरी तरह से नियंत्रण की शक्ति प्राप्त नहीं की है। इसके लिए उसे और अधिक प्रयास करने चाहिए। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मुनि ने अपने आपको कठिन तपस्या में समर्पित कर दिया। तपस्या के दौरान उसने बहुत कष्ट सहे। उदाहरण के लिए अपने हाथों से बिना कोई सहारा लिए खड़ा रहने लगा तथा केवल हवा के सहारे ही जीवित रहने लगा। गर्मी, सर्दी और वर्षा की ऋतुओं तक ऐसा ही चलता रहा। अंत में इंद्र तथा अन्य देवता उसकी तपस्या के बढ़ते प्रभाव को देखकर व्याकुल हुए। उन सभी ने रूपसी रंभा को मुनि की तपस्या भंग करने के लिए कहा, लेकिन रभा ने उस उग्र मुनि के भंकर कोप का सामना करने में अपनी असमर्थता जताई। लेकिन इंद्र के बार-बार कहने पर उसके आदेश का पालन करने के लिए वह तैयार हो गई। इंद्र तथा कंदर्प (प्रेम के देवता) ने उसे वचन दिया कि वे उसकी रक्षा करेंगे। इस पर रंभा ने मुनि की तपस्या भंग करने के लिए अत्यंत आकर्षण रूप धारण किया, लेकिन मुनि